Sunday, October 26, 2008

शरीर - ३

मुझे शब्द ढूँढने होंगे,
बहुत कुछ कहना बाकि है
जब भी झांकता हूँ,
इस झरोखे में नई झांकी है ।
इस भीड़ में खड़ा, ख़ुद से बेखुद सा,
वो पिता है मेरा,
वो... वहां... बीच में, झुरियों वाला जो चेहरा है ।

उसे याद न दिलाना, की यहाँ जो शरीर पड़ा है वो मेरा है ।

वैसा होगा कुछ न उसे, सुन लेगा, सह लेगा,
अपनी सोच में, तपाक से इससे एक वजह देगा,
सोचेगा, कौन कैसे मेरी जगह लेगा ।


कभी गोद में बैठ झूला नही मैं उसकी,
न कभी सीने से लग के रोया,
न होने पे कुछ पाया उसके,
न नही होने पे कुछ खोया,
हर बार ख़ुद से कहा की अगली बार रो लूँगा,
उसके सारे सपने आंखों में अपनी बो दूँगा,
पर धुंधला सा होता गया चेहरा, वक्त के साथ,
अब तो बीच ये काला घाना अँधेरा है,
यहाँ जो शरीर पड़ा है वो मेरा है ।

पता नही कौन सा रंग भाता था उसको,
कौन सा गाना पूरा आता था उसको,
कभी मैंने पसंद न चुनी उसकी,
आवाज़ भी ध्यान से न सुनी उसकी,
हर बार अगली बार कहा,

पर शिकायत सिर्फ़ ये नही है,
पता नही ग़लत कौन, कौन सही है,
मैं भी तो अकेला था,
पर अब क्या गिले,
फासलों में ही तो ये फासले थे पले,
कांपेंगे आज हाथ उसके,
साथ चलेगा जब वो उठके,
किसका था दोष, और कौन निर्दोष,
बे मतलब हो जायेंगे तर्क सारे, सारे नुस्खे,
उम्र भर, अपनी गलतियों से सीख, मेरी ज़िन्दगी तराशता रहा,
मैं उसमें पिता, वो मुझमें बेटा तलाशता रहा ।

अब ख़ुद पे गुस्सा आयेगा,
न कोई मुझ सा भायेगा,
पहला मलाल मेरी रूह से गुज़रा,
काश के मैं कह पाता,

कि उसकी हर डांट रूह के कोने में दबा रखी है,
कि उसकी एक तस्वीर, अब भी सीने से लगा रखी है,
कि उसकी लिखी कविता, किताबों में छिपा रखी है,
अकेला मैं जाऊँगा, पर कर भी जाऊँगा अकेला,
कि अब ख़त्म हो गया ये झमेला,
कि मेरी उँगलियाँ मुझे हमेशा उसी कि याद दिलाती रही,
कि दूरियां हमेशा उस से मिलाती रही,
कि पानी से कहीं ज़्यादा लहू गहरा है,
कि यहाँ जो शरीर पड़ा है वो मेरा है ।

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