Streteching gets worse.
the kicks get harder
The punches become more accurate
My body feel a little more flexible.
Skipping, bending, stretches.
It's just the beginning.
Saturday, January 31, 2009
Friday, January 23, 2009
रंग
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
मुट्ठियाँ कस ली हैं, इस रंग को मिटाना है,
कितनी नींदें खो कर सींचा है इन्हें,
रात रात भर, अंधेरोंसे खींचा है इन्हें,
अब इस रंग को मुझे अपना रंग दिखाना है ।
ढँक दिया है सारे सपनों को,
कफ़न सा बन उन पर फैला है,
इसकी ओट से झांकता है,
हर सपना अब लगता मैला है
जैसे शेहद पर नमक है रखा
सपनों में रंग लगा है पक्का
खुश था मैं बेरंग सपनों से,
आस बांधते अपनों से,
अचानक कहाँ से आ धमका ये,
बेरंगी में रंग क्यूँ चमका ये,
नींद से जगा दिया है,
नया जुनूँ लगा दिया है,
मिटा दूँगा इसे,
हटा लूँगा इसे,
मेरे सपनों पर सिर्फ़ हक़ है मेरा
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
दम घुटने लगा है सपनों का,
साँसे अटकती हैं,
पुतलियाँ आंखों में,
हताश हो भटकती हैं,
पर इतनी जल्दी ये साँसे छोडेंगे नही,
जान से पाले हैं, दम तोडेंगे नही,
मुझसे किया है वादा सेहर तक का ।
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
पर इस बार नींद से जागूँगा नही,
सपनों से दूर भागूंगा नही,
हाथ थाम कर धीरे धीरे,
एक एक कर निकाल लाऊँगा उन्हें,
बेदाग़ बेरंग फिर शायद पाऊंगा उन्हें
जिन्हें रंग दिया होगा इसने,
फिर शुरू से सजाऊँगा उन्हें ।
करूंगा डट कर उस रंग का सामना,
डालूँगा उस में डर की भावना,
सब गाते उसकी खूबसूरती के राग हैं,
पर मेरे लिए वो
मेरे सपनों पर दाग़ है ।
रंग सारे मिटा दूँगा,
सिर्फ़ उजाल रह जायेगा,
बाकी सब धीरे धीरे,
उसी में बह जायेगा,
सब बेरंग हो जायेगा,
फिर न कोई सपने रंग पायेगा,
साफ़ सुथरे धुले धुले से,
पानी के बुलबुले से,
फिर कोई सपनों को न रंग पायेगा,
उजालों में उजला मलंग पायेगा,
सब इस रंग का ही दोष है,
आज जो ज़माना फरामोश है,
हर कोई अपनी ही तरह खिलता है,
जिद्दी है, न किसी से मिलता है
पोंछ दूँगा, उजला कर दूँगा,
सदियों से गंद जमा है रखा,
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
मुट्ठियाँ कस ली हैं, इस रंग को मिटाना है,
कितनी नींदें खो कर सींचा है इन्हें,
रात रात भर, अंधेरोंसे खींचा है इन्हें,
अब इस रंग को मुझे अपना रंग दिखाना है ।
ढँक दिया है सारे सपनों को,
कफ़न सा बन उन पर फैला है,
इसकी ओट से झांकता है,
हर सपना अब लगता मैला है
जैसे शेहद पर नमक है रखा
सपनों में रंग लगा है पक्का
खुश था मैं बेरंग सपनों से,
आस बांधते अपनों से,
अचानक कहाँ से आ धमका ये,
बेरंगी में रंग क्यूँ चमका ये,
नींद से जगा दिया है,
नया जुनूँ लगा दिया है,
मिटा दूँगा इसे,
हटा लूँगा इसे,
मेरे सपनों पर सिर्फ़ हक़ है मेरा
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
दम घुटने लगा है सपनों का,
साँसे अटकती हैं,
पुतलियाँ आंखों में,
हताश हो भटकती हैं,
पर इतनी जल्दी ये साँसे छोडेंगे नही,
जान से पाले हैं, दम तोडेंगे नही,
मुझसे किया है वादा सेहर तक का ।
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
पर इस बार नींद से जागूँगा नही,
सपनों से दूर भागूंगा नही,
हाथ थाम कर धीरे धीरे,
एक एक कर निकाल लाऊँगा उन्हें,
बेदाग़ बेरंग फिर शायद पाऊंगा उन्हें
जिन्हें रंग दिया होगा इसने,
फिर शुरू से सजाऊँगा उन्हें ।
करूंगा डट कर उस रंग का सामना,
डालूँगा उस में डर की भावना,
सब गाते उसकी खूबसूरती के राग हैं,
पर मेरे लिए वो
मेरे सपनों पर दाग़ है ।
रंग सारे मिटा दूँगा,
सिर्फ़ उजाल रह जायेगा,
बाकी सब धीरे धीरे,
उसी में बह जायेगा,
सब बेरंग हो जायेगा,
फिर न कोई सपने रंग पायेगा,
साफ़ सुथरे धुले धुले से,
पानी के बुलबुले से,
फिर कोई सपनों को न रंग पायेगा,
उजालों में उजला मलंग पायेगा,
सब इस रंग का ही दोष है,
आज जो ज़माना फरामोश है,
हर कोई अपनी ही तरह खिलता है,
जिद्दी है, न किसी से मिलता है
पोंछ दूँगा, उजला कर दूँगा,
सदियों से गंद जमा है रखा,
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
Thursday, January 22, 2009
The Mission has begun
Day 1
21st January 2009
9 AM
Basic warm up. Basic stretching.
3 level kicks. 3 level punching.
The mission has begun. It's the test. Of patience. Capability.
Starting from scratch is a big deal.
The day it pains the most, I will do another round.
21st January 2009
9 AM
Basic warm up. Basic stretching.
3 level kicks. 3 level punching.
The mission has begun. It's the test. Of patience. Capability.
Starting from scratch is a big deal.
The day it pains the most, I will do another round.
Monday, January 19, 2009
Just an average thought
हम मना हैं उनके दर पर ।
हकों का फ़ैसला सौंप रखा है उनको,
परस्तिश कहो या कह लो डर
हम मना हैं उनके दर पर ।
एहसासों का हिसाब मांगेंगे तो खामोश रहूँगा,
मेरे इस खजाने से वो हैं बेखबर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
अजनबी सा महसूस करता हूँ साथ उनके
लगता है नया हर बार सफर
हम मना हैं उनके दर पर ।
मेरे सवालों का जवाब नही देते वो,
खुदाई का तो पता नही, बंदगी तो है मगर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
लिख भेजी हैं कई हसरतें, कई दफा,
लफ्जों में ये होती बयां कहाँ मगर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
अब वक्त आ गया है, जब बर्दाश्तसे है सब बाहर,
सीधे उनसे पूछ लेते पर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
हकों का फ़ैसला सौंप रखा है उनको,
परस्तिश कहो या कह लो डर
हम मना हैं उनके दर पर ।
एहसासों का हिसाब मांगेंगे तो खामोश रहूँगा,
मेरे इस खजाने से वो हैं बेखबर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
अजनबी सा महसूस करता हूँ साथ उनके
लगता है नया हर बार सफर
हम मना हैं उनके दर पर ।
मेरे सवालों का जवाब नही देते वो,
खुदाई का तो पता नही, बंदगी तो है मगर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
लिख भेजी हैं कई हसरतें, कई दफा,
लफ्जों में ये होती बयां कहाँ मगर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
अब वक्त आ गया है, जब बर्दाश्तसे है सब बाहर,
सीधे उनसे पूछ लेते पर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
Thursday, January 8, 2009
तर्क - 2
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
करेंगे आसमाँ के अब्र अब अदावत अदा,
पर जुर्रत के जुर्माने का जुनूँ है जुदा,
पाक़ पैमानों पर परदा पेश हो, कर दो पोशीदा,
रूह में रवां रंज का रंग रहे रंजीदा,
खूँ का खुलूस खुबखु है,
रूह से रुखसत रूमानी, अब रूबरू है ।
फिर फिरदौस की फिराक़ में,
ताज़ी तकदीर की ताक में,
रवां रह गए रब्त राख में,
ख्वाबों की खाली ख़ाक में ।
गुबार की गुफ्तगू गुलाम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
माहौल में मातम मर्ज़ का,
दास्तान-ऐ-दर्द दफ्न, पर दर्ज़ था,
आंखों में अश्क अब अच्छे लगते हैं,
ठहर ठहर ठिकाना ठान के ठगते हैं ।
मुक्कम्मल मुश्क का मुक़ाबला है ,
झोंकों के झरोखों से झांकता है
लहू की लाली लश्कर-ऐ-लगाम हुई ।
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
बेबस, बेखौफ पर बहुत बिस्मिल हूँ,
मयकदों में महफूज़ महफिल हूँ,
मंज़र मंज़र मेरा, मैं मंजिल हूँ,
गुज़रते गुबार की गुज़ारिश,
सागर का संगदिल साहिल हूँ ।
आयतों की आस हूँ,
सजदों का सफ़ेद सबब
कफ़न का काला काफ़ हूँ
लफ्जों का लहू,
मज़हब का मतलब,
जन्नत की जुस्तजू,
मौत में मैं माफ़ हूँ ।
हर्फ़ का होंसला,
ख्वाहिश का खला हूँ,
नुमायाँ में नुमां,
पाकीज़गी पे पला हूँ ।
ज़मीन का ज़र्रा ज़र्रा,
कायनात का कोना कोना,
आफताब की आग,
माहताब की मेहर मैं,
लहू की लाली का लहजा,
कुर्बानी का कहर मैं ।
इश्क की इबादत,
अदावत की अकीदत हूँ
गुरूर का गुस्सा,
माफ़ी की मोहलत हूँ ।
मय की मयकशी,
शौक़ की शोहरत हूँ
सुकूं का सिलसिला भी,
सिलसिला -ऐ - सुकूं भी,
जुनूँ का जज्बा भी मैं,
जज्बा-ऐ-जुनूँ भी
तुझ में तुझ सा,
मुझ में मुझ सा मैं ।
तुझ में तेरी, मुझ में मेरी,
ता-उम्र तराशी तमन्ना तमाम हुई,
तकदीर की ताबीर
ता-उम्र तराशी तमन्ना तमाम हुई,
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
करेंगे आसमाँ के अब्र अब अदावत अदा,
पर जुर्रत के जुर्माने का जुनूँ है जुदा,
पाक़ पैमानों पर परदा पेश हो, कर दो पोशीदा,
रूह में रवां रंज का रंग रहे रंजीदा,
खूँ का खुलूस खुबखु है,
रूह से रुखसत रूमानी, अब रूबरू है ।
फिर फिरदौस की फिराक़ में,
ताज़ी तकदीर की ताक में,
रवां रह गए रब्त राख में,
ख्वाबों की खाली ख़ाक में ।
गुबार की गुफ्तगू गुलाम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
माहौल में मातम मर्ज़ का,
दास्तान-ऐ-दर्द दफ्न, पर दर्ज़ था,
आंखों में अश्क अब अच्छे लगते हैं,
ठहर ठहर ठिकाना ठान के ठगते हैं ।
मुक्कम्मल मुश्क का मुक़ाबला है ,
झोंकों के झरोखों से झांकता है
लहू की लाली लश्कर-ऐ-लगाम हुई ।
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
बेबस, बेखौफ पर बहुत बिस्मिल हूँ,
मयकदों में महफूज़ महफिल हूँ,
मंज़र मंज़र मेरा, मैं मंजिल हूँ,
गुज़रते गुबार की गुज़ारिश,
सागर का संगदिल साहिल हूँ ।
आयतों की आस हूँ,
सजदों का सफ़ेद सबब
कफ़न का काला काफ़ हूँ
लफ्जों का लहू,
मज़हब का मतलब,
जन्नत की जुस्तजू,
मौत में मैं माफ़ हूँ ।
हर्फ़ का होंसला,
ख्वाहिश का खला हूँ,
नुमायाँ में नुमां,
पाकीज़गी पे पला हूँ ।
ज़मीन का ज़र्रा ज़र्रा,
कायनात का कोना कोना,
आफताब की आग,
माहताब की मेहर मैं,
लहू की लाली का लहजा,
कुर्बानी का कहर मैं ।
इश्क की इबादत,
अदावत की अकीदत हूँ
गुरूर का गुस्सा,
माफ़ी की मोहलत हूँ ।
मय की मयकशी,
शौक़ की शोहरत हूँ
सुकूं का सिलसिला भी,
सिलसिला -ऐ - सुकूं भी,
जुनूँ का जज्बा भी मैं,
जज्बा-ऐ-जुनूँ भी
तुझ में तुझ सा,
मुझ में मुझ सा मैं ।
तुझ में तेरी, मुझ में मेरी,
ता-उम्र तराशी तमन्ना तमाम हुई,
तकदीर की ताबीर
ता-उम्र तराशी तमन्ना तमाम हुई,
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
Wednesday, January 7, 2009
तर्क
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
ख़लिश और सुकूँ में,
कोई बात अब नही जुनूँ में,
जज़्बातों का जज़्बा ज़ब्त हो चला,
रुख़सत रूह से हर रब्त हो चला,
खलता कल तक था जो खला,
ख्वाम्ख्वाह ख़ास अब ये कम्बख्त हो चला,
आरजू की अब शाम हुई,
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
मुआएना किया मासूम मजबूरियों का,
दवा बन दफ़्न हुई दर्दनाक दूरियों का,
लम्हों की लाशें लाद कर लायी गई,
जनाज़ा जन्मा जले हुए जज़्बातों का,
उम्र ऊब उठी थी उन्स से,
नश्तर के निशाँ निकले नब्स से,
आंसुओं की आस भी हराम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
फिकरे फ़क़त फिरोज़ - ऐ - फ़र्ज़ पर हुए,
मशवरे मासूम मातम - ऐ - मर्ज़ पर हुए,
कुरेद कुरेद कर कब्जे कस्म - ऐ- क़र्ज़ पर हुए
खुदा ख्वाहिशें भी खत्म कर दे,
ज़र्रे ज़र्रे में जिस्म के ज़रा सा ज़ख्म कर दे,
हमेशा, हर बार, हरा रहे,
ख्वाहिशों की ख़लिश सा खरा रहे ।
ग़लत ग़म का गुरूर नही,
संभला साँसों से सुरूर नही,
दरीचा - ऐ - दर्द की दोनों ओर देखा,
मैं ही था उसमें जो ग़मगीन था,
अब हर साँस मेरी हराम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
ख़लिश और सुकूँ में,
कोई बात अब नही जुनूँ में,
जज़्बातों का जज़्बा ज़ब्त हो चला,
रुख़सत रूह से हर रब्त हो चला,
खलता कल तक था जो खला,
ख्वाम्ख्वाह ख़ास अब ये कम्बख्त हो चला,
आरजू की अब शाम हुई,
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
मुआएना किया मासूम मजबूरियों का,
दवा बन दफ़्न हुई दर्दनाक दूरियों का,
लम्हों की लाशें लाद कर लायी गई,
जनाज़ा जन्मा जले हुए जज़्बातों का,
उम्र ऊब उठी थी उन्स से,
नश्तर के निशाँ निकले नब्स से,
आंसुओं की आस भी हराम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
फिकरे फ़क़त फिरोज़ - ऐ - फ़र्ज़ पर हुए,
मशवरे मासूम मातम - ऐ - मर्ज़ पर हुए,
कुरेद कुरेद कर कब्जे कस्म - ऐ- क़र्ज़ पर हुए
खुदा ख्वाहिशें भी खत्म कर दे,
ज़र्रे ज़र्रे में जिस्म के ज़रा सा ज़ख्म कर दे,
हमेशा, हर बार, हरा रहे,
ख्वाहिशों की ख़लिश सा खरा रहे ।
ग़लत ग़म का गुरूर नही,
संभला साँसों से सुरूर नही,
दरीचा - ऐ - दर्द की दोनों ओर देखा,
मैं ही था उसमें जो ग़मगीन था,
अब हर साँस मेरी हराम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
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