Sunday, January 23, 2011

गंगा सागर एक बार

कह गए पंडित, संत सभी,
मैला गंद, कपटी संसार,
मोक्ष मिले, मन धुले,
पञ्च-स्नानी, कह गए महा ग्यानी,
जो करना हो बेड़ा पार,
तो सब तीर्थ बार बार,
गंगा सागर एक बार ।

भगीरथ कुल का एक युवराज,
छोड़ कर सारे राज - काज,
शिव वंदन में जुट गया,
फिर निकली गंगा,
बैकुंठ का द्वार भी उठ गया।
एक डुबकी कर दे संहार,
सब तीर्थ बार बार,
गंगा सागर एक बार।

पाप धुले, पापी का क्या?
हर साल, पापी वही, पाप नया
बुद्धू हैं हम, न समझे,
थक गए कहते संत सभी,
वही बात है, सोचो फिर,
जब डुबकी ले, इस बार वो,
सर पर उसके हाथ धरो,
५ नहीं, १० नहीं, १०० तक गिनो,
सब तीर्थ बार बार,
गंगा सागर एक बार ।
आये थे नंगे, गए हैं नंगे,
सारे बोलो हर हर गंगे!

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