Sunday, July 31, 2011

भगवान के बिकने का महीना है


Plastic bags से ढके हुए,
हर नुक्कड़, हर गली में,
भगवान के बिकने का महीना है

रंग नए पोत कर, अपने हाथों से तराशा है,
कहीं कहीं तो लगा है मेला,
बच्चे जमा हो कर देखते हैं,
जैसे कोई मस्त तमाशा है,
शाम तक, १५-२० बुत्त बिक जायेंगे,
आज तो दुकानदार बाहर खाना खायेंगे
चौड़ा आज हर कारीगर का सीना है
भगवान के बिकने का महीना है ।

बुत्तों के बीच बैठ कर,
५ वक़्त की नमाज़ पढ़ी है
इंसान की भूख
भगवान से बड़ी है
साल में एक मौका तो आता है
जब भगवान गरीब के काम आता है
हर बुत्त में, इंसान का खून-पसीना है
भगवान के बिकने का महीना है

जहाँ कारीगर का हाथ फिसला,
हाथ-पाँव टेढ़े हो जाते हैं,
अब करें क्या,
इसी बहाने बदले पूरे हो जाते हैं
मिट्टी पानी का घोल जिस कारीगर ने बनाया
उसे पता है ,
किस बुत्त ने कितना जीना है,
भगवान के बिकने का महीना है

११ दिनों में, ऐसा मानना है,
सारे दुःख दूर हो जाते हैं,
साल भर तू हमें डुबोते रहना,
साल में एक दिन,
हम तुझे डुबो आते हैं ।

Tuesday, July 26, 2011

ख्याल

मैं ख्याल हूँ, गुज़र जाऊँगा ।

मुझे किसी और के लिए, छोड़ देगा दिल,
दिमाग भी मुझसे परे हो जाएगा
एक लम्हे सा, एक पल सा, नज़र आऊंगा
मैं ख्याल हूँ, गुज़र जाऊँगा ।

अश्क या मलाल,
जुनूं या जमाल,
कुछ ना मांगूंगा,
कुछ तो देकर, मगर जाऊँगा

वो पल, जिस पल नस-नस मैं रहूँगा,
दिल-औ-दिमाग में बस मैं रहूँगा,
ना सुनूंगा, ना कहूँगा,
क्या पता, किधर जाऊँगा

मेरी तलाश में, आएंगे दो नैन,
पर मेरा क्या ठिकाना,
पर रहूँगा यहीं कहीं,
शायद छिपा, शायद नहीं,
मैं दिखूं या ना दिखूं,
पर रहूँगा यहीं कहीं,
मिलूं या ना मिलूं
चाहूँ भी तो कहाँ मर पाऊँगा
पर फिलहाल,
मैं ख्याल हूँ, गुज़र जाऊँगा ।

Wednesday, July 13, 2011

फिर मिला था Worli वाला दोस्त

"क्यूँ भाई, मुझे बेवकूफ बना कर पेश कर दिया कविता में?"
"खुद हीरो बन गए. जैसे की आप ही को चिंता है.
"डूबते Planes की... ट्रेन के accident की?"

आज सुबह फिर मिला था worli वाला architect
खूब बजायी मेरी.
मैंने कहा -"पर बात तो सही थी मेरी"
यहाँ दुनिया मर रही है और तुझे Delhi Belly की पड़ी है"
तुनक कर कहता है
"हाँ साले! तूने बड़ी बदल दी दुनिया!"
"लिख कर Facebook पर डाल दी कविता
4 comments मिल गए. हो गया खुश?"
मैंने कहा - "मैंने कम से कम इतना तो किया.
कविता तो किसी और चीज़ के बारे में भी लिख सकता था"
कहता है - "हाँ हाँ - अच्छी तरह से जानता हूँ तुझे
तू शायर है पर शायरों सा बेवकूफ नहीं है"
पता है तुझे - लोग क्या पढ़ना चाहते हैं. खैर."
मैंने गुस्सा रोका और कहा - "हाँ तो तूने कौन सा खम्बा उखाड लिया?
Delhi belly का sequel बनने से रोक लिया क्या?"
टट्टी मिलेगी - फिल्मों में, और अखबारों में. क्या कर लोगे?"
थोडा संभला और बोला - "hmmm. बात तो सही है तेरी.
anyway... drink बनाऊं?"
जवाब का इन्तेज़ार किया नहीं उसने
पानी और शराब को मिलता देख कर मुझे कुछ याद आया
मैंने झट से पूछा - "तुझे पता है बिपाशा और शाहिद यार..."
उसने मुझे टेढ़ी नज़र से देखा और बोला
"साले... अब मैं लिखूं कविता?"

Tuesday, July 12, 2011

अखबार पढ़ा?



एक दोस्त ने सुबह सुबह,
बहुत ही गहरे अंदाज़ में पुछा - "यार तूने सुबह का अखबार पढ़ा?"

अगले कुछ ३ मिनट के लिए मैं जैसे किसी और दुनिया में चला गया,
उसके एक सवाल की वजह से,
मैंने कई चीज़ें सोच डालीं,
जैसे चल पड़ी हो ख्यालों की रेल गाड़ी,
सोचा -
"कालका एक्सप्रेस की खबर सुनते ही, जब बेटे ने बाप का Mobile try किया होगा,
तो उसने सोचा होगा की कम से कम घंटी तो बजे"
"अगर इस मलबे में मेरी टांग फँस जाती तो?"
सोचा -
"July में हुए blasts के बाद, जो बंदा coma में था, वो बात करने लगा है
क्या वो अपना जन्मदिन अब इसी महीने में मनाएगा?"
फिर सोचा -
"अगर दो फीट से कोई गोली मार दे मुझे, तो क्या दर्द से बेहोश हो जाऊँगा?
और कभी नहीं उठूंगा? 3-4 गोलियाँ मार दे तो दर्द होगा क्या?"
फिर सोचा
"जब Plane पानी में Crash हो, तो मौत झटके से होगी या डूब कर?"
"Taj के सामने फिर गाडियां चलेंगी. इसी महीने में ये करना, आखरी बदला है?"

मुझे ख्यालों में खोया देख कर, वो बोला,
"मैंने पूछा - सुबह का अखबार पढ़ा? Delhi Belly का भी sequel बन रहा है.
बताओ यार - एक बार हग कर काफी नहीं हुआ क्या? "
मैंने कहा - "तो इसके लिए तुझे इतनी tension क्यूँ हो रही है?"
कहता है - "नहीं यार... ये generation कहाँ जा रही है?"
मैंने उसे देखा - 24 साल का architect, worli में पुश्तैनी घर है.
मैंने कहा - "हाँ यार सही बात है, ये generation कहाँ जा रही है."
कहता है - "चल यार छोड़, हम और कर भी क्या सकते हैं...
एक Drink और बनाऊं?"

Saturday, July 9, 2011

मैं अकेला होता गया

जितना अजब दुनिया का ये मेला होता गया, मैं अकेला होता गया

उम्र जुआरी निकली,
इसकी पूरी तैय्यारी निकली,
खुश था मैं बादशाही से,
इसकी इक्कों से यारी निकली,
जब आखरी हाथ, मेरा पहला होता गया, मैं अकेला होता गया

दिल ने भी तो साथ न दिया,
हाथ बढ़ाया, हाथ न दिया,
उम्मीद ही थी, उम्मीद रही,
चाँद न था, पर ईद रही
मेरा दिल से, दिल से मेरा,
जब जब झमेला होता गया, मैं अकेला होता गया

तजुर्बों में घाव ढूँढे,
मुखौटों में भाव ढूँढे,
क्या नाम दोगे उसको,
जो धुप को सर-ए-छाँव ढूँढे
पानी से जब धुल धुल कर,
पानी से मैला होता गया, मैं अकेला होता गया .

कलम हाथ में रह गयी,
बदज़ुबान! किस्सा कह गयी,
सच तो था बस एक मगर,
उस सच की थीं वजह कई
शायद इसी वजह से उजला सच, मटमैला होता गया, मैं अकेला होता गया

दुनिया से यारी कब थी,
मुझे में तलबगारी कब थी
वो तो बेखुदी का ज़ौक चढ़ा था शाम से,
वरना महफिलों से यारी कब थी,
दिन-ब-दिन, महफ़िल महफ़िल, मेला-दर-मेला होता गया
मैं अकेला होता गया
मैं अकेला होता गया

Thursday, July 7, 2011

छायावाद
एक सदी बीत चुकी है छायावाद को बीते
न तो आजकल इस में कोई नए कवि आये हैं, और न ही अब पहले के कवियों की बात होती है. क्या आप सब में से कोई है जो छायावाद में लिखता है? आपका क्या सोचना है छायावाद के बारे में ?

हम न होंगे

कल शायद ये ग़म न होंगे,
मगर कल शायद हम न होंगे ।

ये ख़लिश, ये दर्द, ये रंज के मौसम न होंगे
मगर कल शायद हम न होंगे ।

उम्मीद, ख्वाहिशों के ये सिलसिले, ये जश्न-ए-मातम न होंगे,
मगर कल शायद हम न होंगे ।

इश्क, हसरत, परस्तिश - ये सारे मरहम न होंगे,
मगर कल शायद हम न होंगे ।

ये तन्हाई, ये रुसवाई, ये ग़मज़दा महफ़िलें, ये आलम न होंगे,
मगर कल शायद हम न होंगे ।

आँखों में अश्क़ भर कर, वो गए हैं कह कर - "के कल हम न होंगे"
मगर कल शायद हम न होंगे ।

Monday, July 4, 2011

अँधा कुआँ

गुफ्तुगू तूने सिखाई है, मैं तो गूंगा था,
अब मैं बोलूं तो बातों में असर भी देना । - Traditional lyrics from a Hans Raj Hans Song

अंधे कुँए में छिप बैठा रहूँ,
ठन्डे पानी सा ही ठंडा रहूँ,
रात हो तो अब्र अँधेरे में मिल जाएँ,
गूंगा नहीं रहा तो क्या,
अच्छा है अँधा रहूँ
मुझे इश्क़ नहीं आता तो मर जाता,
इस अंधे कुँए में मेरा अपना शेहर भी देना ।

कुँए की इक दीवार पर,
एक दिन की एक रेखा है,
कितने हुए ख़ुदा जाने,
अँधेरा है, कहाँ देखा है ?
तेरी नज़र का एहसास है मुझे,
मैं जानता हूँ, तू मुझे लेकर परेशान है,
इल्म धड़कन का है तेरी,
जानता हूँ, मुझ सा तू भी बेजान है
गुल नहीं तो न सही,
उम्मीद की एक शजर ही देना

सांसें बख्शी हैं, तेरा दम भरने के लिए,
तो दुआ तो कर,
इस बेक़रारी को कम करने के लिए,
उम्र मेरी इन अंधेरों में आ सिमटी है,
मुझसे ये बे-नूरी आ लिपटी है,
अब हर दिन रात रहती है,
मरी आँखों को बस तेरी ताक रहती है
जल गुजरी है हर हसरत,
राख़, राख़, राख़, राख़ रहती है,
ये मैं हूँ इस अँधेरे कुँए में,
या मेरी ख़ाक, ख़ाक रहती है
जाँ के निकलने का कोई सबब ही देना,
नहीं तो बस एक मुट्ठी सबर ही देना ।
इस अंधे कुँए का मुंह बंद कर दे,
यहीं अन्दर, मुझको मेरी क़बर ही देना ।

The traditional lyrics are very romantic and very positive। My interpretation is very different from the original. It changes the mood of the couplet. Well.

Friday, July 1, 2011

मोड़ पर एक पेड़ है

जब घर से निकलता हूँ, तो रोज़ देखता हूँ,
पास वाले मोड़ पर एक पेड़ है, सूखा सा,
दो एक दिन में गिर जाएगा शायद ।

पत्ते न रहे, न कोई घोंसला,
उजड़े दयार में किसका बसेरा?
सब छोड़ भागें हैं उसको,
रंग बदल कर, खुद ज़मीन सा दिखने लगा है आज कल,
दो एक दिन में गिर जाएगा शायद ।

हरा था तो मैंने कभी उसे देखा नहीं था,
आज सूखा है, तो सबसे अलग नज़र आता है
हर बार उस मोड़ से गुज़रते,
मेरा ध्यान उसी पर जाता है,
येही सच है शायद,
वक़्त-ऐ-नज़ा पर ही उम्र की पहचान होती है,
और खुद अपनी पहचान बनती है
शरीर गवाही देता है,
जो कुछ सहा और देखा है
दो एक दिन में जब, उस मोड़ से गुज़रुंगा,
तो सर ढक लूँगा,
थक कर लेटा हुआ मिल जाएगा शायद,
पास वाले मोड़ पर एक पेड़ है, सूखा सा,
दो एक दिन में गिर जाएगा शायद

दौर

एक दिन था, जब वो दौर हुआ
एक दिन है, अब तो दौर नया

Wednesday, June 29, 2011

मैं भी तेरे जैसा हूँ

Opening Line from a Ghulam Ali ghazal

अपनी धुन में रहता हूँ, मैं भी तेरे जैसा हूँ ।


तू मुझ सा हो गया, और मैं मेरे जैसा हूँ ।
रह रह कर इन स्याह रातों में
रह-रह नूर से डरता हूँ ।
नुमायाँ और बयां का फ़र्क मिट गया,
जैसा हूँ, मैं कहता हूँ ।
ज़माना तो छोड़ दूं, पर ज़माना छूटे कैसे,
कोई महफ़िल ये नहीं, के कह दूं - 'अच्छा चलता हूँ '।
इस दुनिया को इश्क़ की पहचान, आशिक़ों से बेहतर है
बहुत क़रीब से दुनिया देखी है, तो कहता हूँ ।
बेशक्ली, बेख़याली, बेख़ुदी,
मैं बस मेरे जैसा हूँ ।
अपनी धुन में रहता हूँ, मैं भी तेरे जैसा हूँ
तू मुझसा हो गया, और मैं मेरे जैसा हूँ ।

Saturday, June 25, 2011

शायर की ज़िन्दगी

क़र्ज़ की ज़िन्दगी, शायर की ज़िन्दगी ।

एक मुट्ठी मायूसी,
दो दाने मुफ़लिसी,
जाम भर मसर्रत,
दो पल हसरत,
किसी की दवा, किसी के मर्ज़ की,
क़र्ज़ की ।

नाम का लहू,
ना-काम का ग़ुस्सा,
लफ्ज़ का गुरूर,
बेख़ुदी का सुरूर,
अश्क, उन्स, मन्नत,
दोज़ख़, जन्नत,
ख़्वाब, ख्वाहिश, ख़लिश,
दर्द की तारीख़ जो किसी ने दर्ज की,
क़र्ज़ की ।

जो 'बाक़ी' रह गया,
उस में उम्र काट ले,
बड़ी आसानी से,
ख़ुशी से भी ग़म छाँट ले ।
उम्र से कब्र,
बेसब्र है बेसब्र,
बेज़ार भी बेदार भी,
कुछ ले लिया हर किसी से,
मिला लिया अपनी ख़ुदी में,
सुख़नवर है, दर-बा-दर है,
बहुत खुश-बद-नसीब है,
ख़ुदा का रक़ीब है
ख़ुद से परे,
हर किसी से क़रीब है ।

ख़ुश है, जब बदनाम है,
ख़ुश है, जब ग़मज़दा,
जब है फ़ना, या है फ़िदा,
जब भरा हो पैमाना,
और जब ख़ाली हो मयकदा
इश्क़ है हर किसी के खले से
अपनी कमी मिटा ले,
हर किसी के खले से,
मतलबी है, मासूम नहीं,
मग़रूर है, महरूम नहीं ।
अशआरों में हिम्मत,
हौंसलों के किस्से,
बातें,
मुहब्बत, उसूल, कायदों की,
बातें, बस बातें
किसी से जज़्बात, किसी से हालात,
किसी से चुरायी कहानी फ़र्ज़ की
शायर की ज़िन्दगी, क़र्ज़ की
कायर की ज़िन्दगी
शायर की ज़िन्दगी ।

Friday, June 24, 2011

मिर्ज़ा

चल मिर्ज़ा औथे चलिए, जित्थे सारे अन्ने,
मैं बस आंखां ना तेरा, तूं बस मेरी सुन्ने ।

Thursday, June 23, 2011

महजबीं


महजबीं

पैमानों से देखी दुनिया,
हमेशा रंगीन रही,
उसकी नज़र में,
किसी के चेहरे की सुर्खी कम न हुई
मगर येही रंग ले डूबा ।

किसी के चले जाने के बाद,
उसके 'गुनाह' भी हर कोई,
'दिलेरी' की तरह देखता है
बेवजह की हसरतों में,
बेवजह ही वजह देखता है ।
गुनाह, ग़म, मलाल, मुहब्बत,
खला, ख्वाहिश, इंतज़ार, दिलेरी
महजबीं ।

जब ख़ुद ही अधूरे रहे,
तो लफ़्ज़ों का क्या कुसूर,
मगरूर भी, मजबूर भी,
हुए भी तो क्या मशहूर
मंज़ूर, न-मंज़ूर, फिर मंज़ूर,
हुए भी तो क्या मशहूर,
एक ख़ाली पैमाने सी ज़िन्दगी में,
जाने क्यूँ दुनिया रंग भरने पर तुली है,
इस किताब के सारे वर्क़ ख़ाली हैं,
उतनी बंद, जितनी खुली है
पर शायद दुनिया को सुलझानी ये पहेली है,
क्यूँ इतना ख़ूबसूरत था ये सुरूर
इन्ही लोगों ने खोला है ये बाज़ार
हुए भी तो क्या मशहूर ।

लुत्फ़ तो आता है बेलुत्फ़ी से,
वरना जहाँ में किसी को क्या किसी से,
अच्छा किया,
सुफेद और स्याह से परे रखी ये दुनिया
अच्छा किया,
भरे पैमानों से तकी ये दुनिया ।

भला बुरा, सच-झूठ, इश्क़-वजह,
दुनिया देखती रही,
रिश्तों का चश्मा चढ़ा कर,
पैमाना या साक़ी,
जब जी चाहा,
छू लिया हाथ बढ़ा कर
चंद लम्हों के लिए,
बेबसी के लम्हे डुबो दिए,
उन डूबे लम्हों में, मलाल मिला कर,
पी लिया... ज़हर बना कर ।

बेख़ुदी को कमज़ोरी कहता है,
क्यूंकि आधा ज़माना इससे दूर रहता है
बेख़ुद ख़ूबसूरती में कितना ज़ोर है
कौन जाने ।
बेख़ुदी, मयकशी,
महजबीं ।

महजबीं means Beautiful, moon-like in Urdu, while it means 'Strong' in Arabic. Meena Kumari's (1932-72) real name was Mehjabeen Bano.

मुझे से क्यूँ मिल गयी मैं

ये मुझ से क्यूँ मिल गयी मैं ।

सवालों में उलझी,
ख्यालों में उलझी थी, तो बेहतर था,
खुश थी, बोलती थी,
थी बस थी ।
मगर कब, नहीं रही मैं,
ये मुझ से क्यूँ मिल गयी मैं ।

अजनबी से हमेशा से परहेज़ था,
ऐसा भी नहीं के, ये तूफाँ कुछ तेज़ था,
ऐसा भी नहीं के दुनिया एकाएक चलने लगी,
ऐसा भी नहीं के एकाएक रह गयी खड़ी मैं ।

कभी कोई ऐसा इंतज़ार नहीं था,
मगर ऐसा भी नहीं के,
इंतज़ार नहीं था,
तलब क्या है ये कोई नहीं पूछता,
तलब क्यूँ है, ये सब पूछते हैं
नादान हैं, बेसबब ख्वाहिशों का सबब पूछते हैं
काफ़िर हैं, आयतों का मतलब पूछते हैं
जाने किस से मैं क्या कह निकली ।

जब वक़्त आ जाए तो देखो क्या बाक़ी रह गया
उम्र में ये न देखो के क्या कितना किया है
कितना पल पल मरा देखो और बोलो,
कौन कितना जिया है
ख़ाली पैमानों को छोड़ो, आँखों में देखो,
जुनूँ कितना पिया है ।
जलती मय में बेवजह मैं बर्फ़ पिघली ।

क्या इस मोड़ पर बेवजह ही आ गयी हूँ?
या ये कोई मोड़ ही नहीं,
सीधे रास्ते की वो जगह है,
जहाँ से आगे की राह दिखती नहीं
जो भी है, ख़ूबसूरत है,
और अगर ख़ूबसूरत नहीं भी है,
तो क्या फ़र्क पड़ता है ?
आगे रास्ता न भी हुआ,
तो क्या फ़र्क पड़ता है ?
आगे वास्ता न भी हुआ
तो क्या फ़र्क पड़ता है ?
क्या फ़र्क पड़ता है के हक़ीक़त से छिल गयी मैं
ये मुझ से क्यूँ मिल गयी मैं ।

इस बार नहीं बदली मैं,
इस बार नहीं हिली मैं,
इस बार हूँ वही मैं,
इस बार रही नहीं मैं,
बस जैसे उपरी सतेह निकली,
वही रही खड़ी पर,
तिनके की तरह मैं बह निकली ।

Tuesday, June 21, 2011

साहिर


अब साहिर कहाँ रहते हैं ?

शायर को उम्र से यूँ भी क्या चाहिए,
इश्क़, ग़ुरूर और मजाल काफ़ी है,
कलम पकड़ने को दो उँगलियाँ,
ज़ौक-औ-क़माल काफ़ी है ।
ज़िन्दगी के तजुर्बे तो स्याही बन ही जाते हैं
मसर्रत इतनी नहीं, एक मलाल काफ़ी है ।

कौन मानता है ख़ुदा इश्क़ को?
कौन कहता है के इश्क़ में हौंसला होता है?
इश्क़ कमज़ोरी है 'साहिर'
हर आशिक़ मायूस-औ-मजबूर है,
वरना हर इंसान क़ायर नहीं होता
हर आशिक़ शायर होता हो शायद,
मगर आशिक़, हर शायर नहीं होता ।
हर शायर, शायर तो होता है लेकिन,
हर शायिर साहिर नहीं होता ।

ऐसा ही है लफ़्ज़ों का कारोबार,
नुख्सान या नफा नहीं होता,
ख़ुदा न समझा अब तक,
शायर उस से कभी ख़फ़ा नहीं होता,
उसका गिला तो इंसानों से है,

न ज़मीं पर न फ़लक पर,
मौसिक़ी तो रह जायेगी हवा में,
उसका पता ठिकाना नहीं होगा,
दुनिया तो रह जायेगी,
मगर वो ज़माना नहीं होगा,
अब उनकी गली से, आना जाना नहीं होगा,
चर्चे होंगे, किस्से होंगे, हिस्से होंगे जिसके,
अब वो फ़साना नहीं होगा ।
अब वो अफ़साना नहीं होगा ।

उम्र को समेट कर रख देने को
एक अशआर काफ़ी है,
दर रहा न रहा,
मकाँ रहे न रहे,
चैन से सोने को, एक मज़ार काफ़ी है
चैन से सोने को एक मज़ार काफ़ी है ।
ता-उम्र और सदियों में जो न हो सका कभी,
वो उनके जाने के बाद हो गया,
उनकी जगह किसी और ने ले ली,
पता नहीं इस बात पर वो क्या बात कहते हैं ?
एक ख़त लिख कर ये बात उनसे पूछनी है,
मगर लिफ़ाफ़े पर, पता क्या लिखूं, कहाँ रहते हैं ?

Sahir was buried at the juhu Muslim cemetery. His tomb was demolished in 2010 to make space for new bodies.

Monday, June 20, 2011

5km लम्बी गुफ़ा

5km लम्बी गुफ़ा के मैं बीचोंबीच रुक गया ।

गुप्प अँधेरा दोनों तरफ था,
मौसम जैसे बरफ था,
इतने अँधेरे में क्या पता,
मुंह से धुआं निकल तो रहा होगा ।
अब यहाँ कुछ मुझे हो जाए तो,
सब कुछ कितना आसान रहेगा,
दूर तक कोई नूर नहीं,
नज़र कुछ आता कहाँ,
क्या ग़लत? क्या सही?
अँधेरा मुंह खोल कर,
मेरे चेहरे पर झुक गया,
5 km लम्बी गुफ़ा के मैं बीचोंबीच रुक गया ।

यहाँ रहूँ तो कितने दिन रहूँगा,
मान लो, न कोई गाडी यहाँ से गुज़रे,
न कोई रौशनी आये यहाँ,
हफ्ता दस दिन?
महीना भर ज़्यादा से ज़्यादा ।
नहीं, आत्महत्या का इरादा नहीं है,
न ही इस कायरता की हिम्मत है मुझ में,
पर सारे फ़र्क मिटाना चाहता हूँ ।
महीना भर ज़्यादा से ज़्यादा,
फिर तो चलने फिरने की ताक़त भी नहीं रहेगी,
बाहर निकलने ही हसरत तो भूखी मर ही जायेगी ।
अच्छा है, फिर कोई चारा ही नहीं रहेगा,
ऐसे काले कल की उम्मीद में,
5 km लम्बी गुफ़ा के मैं बीचोंबीच ही रुक गया ।

अब की बार ये जांच भी हो जाए,
की किसी इंसान का क्या हो सकता है,
महीने भर के बाद भी मैं अगर नहीं मारूंगा,
तो अँधेरे से फिर कभी नहीं डरूंगा,
दुनिया इतनी ज़्यादा अभी देखी नहीं,
कहने को अभी तजुर्बा भी इतना नहीं,
पर सोचा अब कुछ दिन,
अँधेरे में ही रहना चाहिए, इसी लिए
5 km लम्बी गुफ़ा के मैं बीचोंबीच रुक गया ।

Sunday, June 19, 2011

ख़ैर

ये बादल उड़ कर कहाँ जाते हैं ?

हल्की हल्की बारिश हो रही थी
मैं बैठ कर इंसानों की कीमत लगाता रहा शाम भर,
कुछ महेंगे पड़ गए, कुछ मेरी औकात में थे,
कई रिश्ते भी नाप रहा था
कुछ उधड़ रहे थे, और कुछ में गाँठ पड़ गयी थी,
कुछ अब मुझे नहीं आते, छोटे पड़ने लगे थे,
कुछ शायद ज़्यादा गहरे लगने लगे थे,
कुछ शायद कम ठहरे लगने लगे थे
अधूरे छूटे रास्तों की दुहाई देनी जब बंद की,
तो शायद दो पल को सांसें भी थोड़ी मंद की,
और सोचा - ये बादल उड़ कर कहाँ जाते हैं ।

जिस मोड़ पर मैं खड़ा था,
आगे काफ़ी रास्ता पड़ा था
पर जाता कहाँ था, क्या पता?
पीछे यूँ तो कभी मैं देखता नहीं,
क्यूंकि गुज़रा हुआ पल 'सच' होता है
बदला नहीं जा सकता,
तो देखने का फायदा क्या था, क्या पता?
और यूँ भी ख़ुशी से ज़्यादा ग़म याद रहते हैं
और सोचो तो लगता है,
जहाँ कल खड़े थे, वहीँ खड़े हैं
तो सालों आगे बढ़ा कहाँ था, क्या पता?
मर के कोई गढ़ा कहाँ था, क्या पता?
पर सोचो तो - ये बादल उड़ कर कहाँ जाते हैं?

गिरा था, तभी तो उठा था,
ग़लत था, तभी तो सही था
तजुर्बे का अभिमान क्यूँ होता है,
तजुर्बा तो सिर्फ़ ग़लतियों से होता है,
पर इंसान को अभिमान का बहाना चाहिए ।
मैं जहाँ हूँ, शायद कोई मेरी जगह होना चाहता होगा,
जिस बात पर मैं हँसता हूँ,
वो उसी बात पर रोना चाहता होगा,
पर वो वहीँ है, और मैं भी यहीं हूँ,
पता नहीं यहाँ से - ये बादल उड़ कर कहाँ जाते हैं ?

कहाँ क्या कमी है?
कहाँ क्या नहीं है?
मैं क्या तलाश रहा हूँ?
ज़्यादा खुश? या ज़्यादा उदास रहा हूँ?
इतने लोग, रात, रोज़ घर जाते हैं?
क्या कभी कुछ काफ़ी होगा?
किसने आखिर पहना है चोगा?
हर मोड़ से आगे, क्या रास्ते कहीं ले जाते हैं?
या सालों बाद भी वहीँ छोड़ आते हैं ?
ये बादल उड़ कर कहाँ जाते हैं?
ख़ैर ।

Wednesday, June 15, 2011

ये दुनिया ये महफ़िल

ये दुनिया, ये महफ़िल मेरे काम की नहीं ।
न मैं समझ पाया इसे
न ये समझी ।
ये मुझे ढूँढती रही,
मैं इसे ।
जब अशआर कहीं निकलेंगे मेरे,
जब ज़िक्र होगा भूले से,
तो अश्क दो भी काफी होंगे,
दो अश्कों में हिसाब सारा हो जाएगा,
जी ली जितनी जीनी थी,
जो न जी, वो नाम की नहीं
ये दुनिया, ये महफ़िल मेरे काम की नहीं ।
मेरे नाम के नीचे बस जगह खाली रख देना,
अलफ़ाज़ कहीं किताबों में कैद रख देना
आना न पड़े तो अच्छा, पर दुबारा यहाँ आया तो,
नाम के नीचे की खाली जगह से पहचान लूँगा,
जगह रहेगी, खाली जगह की, मेरे नाम की नहीं
ये दुनिया, ये महफ़िल मेरे काम की नहीं
उम्र की सरहद तो तय है, पर तमाम की नहीं ।
लफ्ज़ मेरे पढ़ कर कोई न रोये तो बेहतर,
कद्र रहे उम्र की, अंजाम की नहीं ।
इस दुनिया में, दुनिया तलाशता रहा,
मिल गयी तो परेशान हूँ,
मैं न मिलूंगा, क्यूंकि मैं नहीं हूँ,
न ये परेशान थी, न होगी,
मुझ सा कोई मिल जाए तो याद तो आएगी,
मेरे जाने के बाद तो आएगी
हर लफ्ज़ में रह जाऊंगा,
मैं भी तो इसके अब कुछ काम का नहीं
और ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं ।

Sunday, June 12, 2011

शिक़ायत

शिक़ायत अंधेरों से क्यूँ हो, ये नूर से लड़ते हैं
शिक़ायत नूर से हो, जिससे अँधेरे बनते हैं