Monday, September 29, 2008

शरीर

The thought behind this is someone else's. the person knows it. thanks!

This is the first part of the poem. The second part will follow. may be some more parts will follow. the words dont seem to stop.

Will try and cover another aspect in the next one.


यहाँ जो शरीर पड़ा है, वो मेरा है ।

रिश्तों के झूठे-मूठे ढकोसलों का,
कुछ टूटे-फूटे हौंसलों का,
बची कुची धडकनों का,
कटी फटी अड़चनों का,
हिसाब बाकी रह गया... फिर सही !

भीड़ में मिले-जुले कुछ चेहरों का,
जज्बातों की आधी अधूरी नेहरों का,
चली अन्चली कुछ चालों का,
सुने अनसुने कुछ सवालों का,
जवाब बाकी रह गया... फिर सही !

उजाले नए कई देखे,
अब देखने वाला तो ये नया अँधेरा है ।
यहाँ जो शरीर पड़ा है, वो मेरा है

बहेंगे कुछ आंसू, सच्चे कम, झूठे ज़्यादा,
मेरे फैसलों से सहमत थे कम, रूठे ज़्यादा,
रख बैठेंगे अब दिल में मलाल,
करते रहेंगे ख़ुद से सवाल, ख़ुद से बवाल,
जब माथे पर मेरे जडेंगे गुलाल,
इस बार नही खुलेंगी ये आँखें,
न उठेंगी ये मृत भोहें,
बस दोहराते रहना अपने मन में मेरी बातें,
सोचते रहना काश क्या 'नही' किया होता,
भूल जाओगे मेरी, बस याद रह जायेंगी अपनी घातें,
याद रहे, बचे कुचे रिश्तों को निभाना, नाम देना, अब काम तेरा है ।
यहाँ जो शरीर पड़ा है, वो मेरा है

कितना कठिन था जीना, जीता था तब नही लगा,
इस नींद में सोया तो अच्छा लगा जब नहीं जगा,
सबकी सोच में ख़ुद की सोच कहीं खो बैठा था,
कई बार किसी और के आंसू रो बैठा था,
किसी और की अदा पर कई बार मैं ऐंठा था,
कितनी बातें, कितने पल, कितने एहसास,
कितने आंसू, छिपा कर रखे थे अपने पास,
सोचा था वक्त आएगा तो रो दूँगा,
सारी जमापूंजी खो दूँगा,
सब रह गया, मैं बह गया,
हिसाब बाकी रह गया... फिर सही !


किसी पे क्रोध नही, न किसी पर ग्लानी है,
रह जाता बस दो खुली मुठी पानी है,
सब खो दिया रिश्तों को बनाते बनाते,
सब पा लिया यहाँ से जाते जाते ।

ये ठंडा फर्श, ये ठंडा जल,
ये ताजे फूल, जो मुरझा जायेंगे कल,
न रहेगा मुह में पड़ा छाला,
जल जाएगा साथ ये घृत का प्याला,

सोचूंगा येही मैं शायद, पर अजीब लगेगा,
की यहाँ जो शरीर पड़ा है, वो मेरा है

Sunday, September 28, 2008

तुम

हर रोज़ जो सवेरा करे, वो सूरज की किरण हो तुम,
नहा लूँ उस रौशनी में मैं, जो बिखेरे हो तुम,
कभी साया बनके, कभी अक्स बनके मुझे घेरे हो तुम,
रोज़ इसी तरह दिन निकले, तो लगे की मेरे हो तुम ।

छूअन की मदहोशी अभी नसों में बाकि है,
अच्छा है नसें दफ्न हैं, महफूस हैं,
साँसों के आने जाने से, धडकनों के रुकने चलने से,
बदलता नही ये मंज़र,
हलकी सी बेहोशी अभी नसों में बाकि है,
शायद ये इबादत का है सिला जो इस तरह नसों में ठहरे हो तुम,
रोज़ इसी तरह दिन निकले, तो लगे की मेरे हो तुम

आँखें खुलीं, फिर उन आंखों में खो गयीं,
आंसू न बहे, खामोश रो गयीं,
पाना हो गया खोना, खोना पाना हुआ,
सूरज की किरणों सा ये तो,
एक नई सुबह का आना हुआ,
आज नम हुईं आँखें तो लगा,
हमें खुश हुए था एक ज़माना हुआ,
पलकों के झपकने में तेरा ओझल होना,
रूह पर चोट खाना हुआ,
यादों की पर्तों से पता चलता है, रूह पर कितने गहरे हो तुम,
रोज़ इसी तरह दिन निकले, तो लगे की मेरे हो तुम

Monday, September 22, 2008

कुछ किया है!

मुझे मुश्किल नही है मुश्किल से,
आसानी से डर लगता है ।

सीखी, रची, फिर आदत बनाई,
हर मुश्किल आसान बनाई,
जब आसान हर मुश्किल है,
फिर पाने में क्या हासिल है,
कर जाने में जीत अगर है,
न कर पाने में क्या होगा?
पा जाने में जीत अगर है,
न पाने में क्या होगा?
गिर कर, उठ जाने में जीत अगर है,
न उठ पाने में क्या होगा?

'न आने' में ही कला है,
आ जाने पर एक नया खला है,
सुबह उठ चेहरा देखूं, तो कुछ अधूरा लगे,
विचलन हो मन में तो कुछ पूरा लगे,
मुश्किल हो तभी तो आसान करूंगा,
आसानी में सब सूना लगे ।

नही होगा, तभी करुँ मैं,
जब जी सकूं तभी मरूं मैं,
न चल पाऊँ, तभी चलूँ मैं,
न कर पाऊँ, तभी करुँ मैं,

मुश्किल नई नही तो जीना कैसा?
क्या कहूँगा कल ख़ुद को? क्या किया है?
साँसे तो चलती ही थी, क्या जिया है?

आसान है अंत तक जाना,
शुरुआत करुँ तो लगे कुछ किया है ।

Tuesday, September 16, 2008

Can't!

Yes!

I havent been writing for a long time now. Was just thinking, why?

I think my mind has stopped functioning. It has refused to read the newspapers, or watch the news or even stay awake for that matter.

Anyway... I decided i will write something today.

So here goes.

Nothing in the recent past has moved me. All I know is that I have thrown myself into a situation which i thought i wouldnt be able to handle.

Thats all. So I guess I am too busy being nervous to have anytime or any thought about anything else.

Again... another mindless post. Another wasted effort for the ones who read this. Some more words gone down the drain. Some more emotions, gone unnoticed.

But why? Why cant i write? And I am ok with it? Why?

Sunday, September 14, 2008

I was just fooling around!

okay! i was just fooling around. i never really meant it man! relax. 

but now... is this what i have been waiting for? is this what i always wanted to do? fine, i had an opinion on almost everything, TV shows, ads, movies, short films, songs, music, singers... the list goes on. 

and i was just fooling around man! never really meant i was capable. having an opinion is different, but actually creating something on which anyone or everyone would have an opinion, is different. 

I dont think I can actually do it. For years i have only learnt destroying. destroying other people's ideas, their ability, their effort. Its easier to destroy than to create. now i know.

I dont have a degree in mass communication. I dont have an MBA either. My qualification has nothing to do with my profession. 

Writing was always something that i wanted to do. I did. and I managed. Don't regret that at all. but this is different. 

Walking into a new office tomorrow, sitting with the people who know where they are and what they are doing, on the same table and discussing something that's their job. their forte. their expertise. they have put years behind them. learning at every step. 

I just walk into their office, have a coffee with them, and settle on a chair, thats not mine. I dont know if i even deserve it. If i even justify it. 

What would I do when they'd expect me to answer a certain question? go blank? 

Well... tomorrow is 15th september. and 11 AM is the scheduled time. I might be just fooling around.

No!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

Sunday, August 17, 2008

उम्र

उम्र जलवों में बसर हो, ये ज़रूरी तो नही,
सबकी आहों में असर हो, ये ज़रूरी तो नही ।

कायदा बरता है हमने फुरकत में भी,
पर हर हुक्म की ख़बर हो, ये ज़रूरी तो नही ।

परस्तिश कैद है बुतखानों में,
खुदा काबू में मगर हो, ये ज़रूरी तो नही ।

Tuesday, August 12, 2008

एक और आज़ादी

लो आ गई एक और आज़ादी ।


१५ अगस्त के आस पास, मुझे कुछ हो जाता है,
सारा संयम अकस्मात जैसे खो जाता है,
देश प्रेम उमड़ने लगता है,
सिगनल की लाल बत्ती पर खड़े हुए,
मन विचलित हो, तन से बिछड़ने लगता है,
याद आता है गाँधी मुझको,
'जन गण मन' हवा में छिड़ने लगता है,
इस महीने के वेतन को, व्यर्थ नही करूंगा मैं,
अपनी मासिक किश्तों के साथ,
किसी भूखे का पेट भी भरूँगा मैं,
इस महीने... अ ... अ... चलो अगले महीने ये करूंगा मैं,
गाड़ियों की आवाजों में,
मुझे सुनाई देती है वो क्रांति की पुकार,
बाग़डोर आई थी अपने हाथ, देखता था सारा संसार ।

इतना देश प्रेम २८ सालों में पहले न समझा था मैंने,
एक छोटे से बच्चे से खरीद,
एक तिरंगा अपनी गाड़ी में जड़ दिया ला मैंने,
२० रुपये कहा था, १० में मना लिया था मैंने,
ये उनके नाम है, जिन्होंने खोयी अपनी जवानी थी,
पढ़ी थी एक कविता बचपन में,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी,

मैंने कहा था, १५ अगस्त के आस पास मुझे कुछ हो जाता है,
सारा संयम अकस्मात जैसे खो जाता है ।

आज सिर्फ़ सुनूंगा, स्वदेस (शाह रुख वाली),
बॉर्डर, हक़ीक़त या परदेस के गाने,
जाऊंगा गीली आँखें लिए, तिरंगे को लहराता देखूँगा,
न्यूज़ चैनल्स पर बमों की ख़बरों से थक,
नए चैनल पर जोधा अकबर देखूँगा ।
ad agencies के दुःख में शामिल हो,
पेपर में आधा अधूरा तिरंगा देखूँगा ।
law है - तिरंगा पेपर में नही छपेगा,
कुछ देर फिर अधिकारियों को कोसूँगा ।
देखूंगा सुबह का दिल्ली में आज़ादी समारोह,
सुनूंगा मुस्कुराता प्रधानमंत्री का भाषण,
देखूँगा रुआंसा हो, सिपाहियों की समाधी,

लो आ गई एक और आज़ादी ।

ये flag hoisting के पेढे, क्यूँ इतने मीठे होते हैं,
मरे से क्यूँ हैं ये फूल झंडे से जो गिरे हैं,
क्या colony वाले रात में ही इन्हें झंडे में बाँध कर सोते हैं ?
ये अगस्त के महीने हर साल बारिश के ही क्यूँ होते हैं ?

चलो कोई चिंता नही है,
कल सब ठीक हो जायेगा,
सारा संयम फिर से मुझको प्राप्त हो जायेगा
तिरंगा अख़बार से, टीवी से, मेरी गाड़ी से लुप्त हो जायेगा
मात्र १० रुपये में मिलता है, अगले साल फिर ले लूँगा,
घर में किताबों के पीछे उसकी जगह भी बना दी,

लो आ गई एक और आज़ादी ।

Sunday, August 3, 2008

तगफ़ुल

तगफ़ुल करना फ़ितरत में तो नही,
पर आज तगफ़ुल करना होगा ।

उन आंखों में रंज ज़्यादा था,
इतने रंज का इल्म हमें न था,
लफ्ज़ ख़बीदा थे,
मायूस थे, आबीदा थे ।
अश्क़ दीवाने थे,
बस अभी बह जाने थे,
इस दिल को ख्वाहिशों से,
उन ख्वाहिशों को दिल से डरना होगा,
तगफ़ुल करना फ़ितरत में तो नही,
पर आज तगफ़ुल करना होगा ।

रंजिशों पे बंदिशें लगी,
काफ़ी तब्दीली थी हरक़त में,
एक मिस्रा निकलेगा वस्ल में,
कई निकलेंगे फ़ुर्कत में,
ऐसा होता है अकीदत में,
या कदम रखा है वहशत में ?
इक्थियार पर एक अशआर करना होगा,
तगफ़ुल करना फितरत में तो नही,
पर आज तगफ़ुल करना होगा ।

एक ही अफ़सोस है,
उन्स फिरदौस है,
ये भी ख़बर है,
अभी आयतों में असर है,
पर शायद इस तगफ़ुल का अंजाम मुक्कद्दर का मरना होगा,
नूर-ऐ-उल्फत-ऐ ख़ुदा अंधेरों से डरना होगा,
उन आंखों का रंज रूह में है,
इस दिल के ग़म का क्या वरना होगा,
क्यूंकि तगफ़ुल करना फितरत में तो नही,
पर आज तगफ़ुल करना होगा ।

तमाम तगफ़ुल तमाम हो ।

Sunday, July 27, 2008

पलकें

मैं पलकें नही झपकता,
डर लगता है ।

उस एक पल में,
कितनी जिंदगी है,
उस एक पल में,
कितनी है मौत,
उजाले से अँधेरा,
अंधेरे से फिर उजाला हो न हो,
मैं उस अंधविश्वासियों में से हूँ
जिसे अँधेरा मौत का घर लगता है,

मैं पलकें नही झपकता,
डर लगता है ।

आंखों में पानी रहता है,
कभी रुकता, कभी बहता है,
कैद करता रहता हूँ छवियों को,
बेच दूँगा किसी दिन कवियों को,
पुतलियाँ जब जवाब दे जायेंगी,
पलकें जब भारी हो जायेंगी,
रंग छूटने लगेंगे पहले,
नहले लगने लगेंगे दहले,
त्रुटियां ओझल हो जाएँगी,
जब पलकें बोझल सो जायेंगी,
सिखाया है इनको, पर प्रवृति से हैं पोस्ती,
पर हो न पायेगी अंधेरे से दोस्ती,
उस दिन आत्मबल बढ़ा पलकों पर लपकूंगा,
न रहेंगी, न झपकूंगा ।

फिर देखूँगा,
हर पल क्या मंज़र लगता है,
मैं पलकें नही झपकता,
डर लगता है ।

सूरज

बस अब बहुत हुआ,
आज सूरज कुरेदना है।

छुपता है बादलों के पीछे,
आज तू देख नीचे,
नीचा दिखाना है तुझे,
बुझा न पाया तो,
कुछ मंद बनाना है तुझे,
बहुत उगली आग तुने,
अब तुझ पे अंगार उंडेलना है,

बस अब बहुत हुआ,
आज सूरज कुरेदना है ।

तुझे छीलूंगा,
तो रोशनी नाखूनों में भर जायेगी,
तपन, खाल में घर कर जायेगी,
फिर भी निहथा आऊंगा,
तेरी जिद्द को अपनी जिद्द से मिलवाऊँगा,
तेरी ही आग में तुझे जलाऊँगा,
समेट ले जिन किरणों को समेटना है,

बस अब बहुत हुआ,
आज सूरज कुरेदना है ।

नया दिन, नई रोशनी,
इसी बात का न तुझे गुरूर है,
नही बदलती जिंदगी,
ये तेरा ही क़सूर है,
हँसता है, मज़ाक उडाता है,
रोज़ वही कहानी लिए आ जाता है ।

पर अब और नही,
न नई रोशनी, न नया दिन,
न नई उम्मीद, न पल कठिन,

कल ये किस्सा ख़त्म,
अब बस तेरे लिए थोडी संवेदना है ।

बस अब बहुत हुआ,
आज सूरज कुरेदना है ।

कल सुबह फिर रात होगी ।
न होगा कल, न कल की बात होगी ।

Thursday, July 24, 2008

आसमान


आज आसमान सफ़ेद है,
थोडी मस्ती हो जाए!


हरे - हरे पत्तों की पेस्ट बना कर,

थोड़ा सा गुलाब का रंग निकाल कर,

छिड़केंगे आसमान पर,


या फिर मिट्टी में पानी मिलाकर,

पोथेंगे और भूरा कर देंगे सारा आकाश,

फिर थोडी रौशनी के टुकड़े उठा कर,

छोटे-छोटे तारे बना कर,

टांगेंगे आसमान पर।

अच्छा है उस से पहले, मिट्टी थोडी सस्ती हो जाए,


आज आसमान सफ़ेद है, थोडी मस्ती हो जाए!


रंग लेकर जामुन से, समुन्दर से नीला पानी ले कर,

लेंगे नारंगी - संतरों से, hari hari क्यारियों से लेंगे हरियाली,

शिमला के सेबों से ले लेंगे लाली,

बनाएँगे नया एक इन्द्रधनुष, चाहे कितना भी दांते माली,


पर पहले सारी बस्ती सो जाए,

आज आसमान सफ़ेद है, थोडी मस्ती हो जाए!


खेतों की पकती धान से, चुरा लेंगे सुनेहरा रंग,

उस में थोड़ा गुड़ मिला कर, करेंगे थोड़ा गहरा रंग,

खाने की प्लेट से, एक गोला बनेगा,

सीधी-सीधी लइनों से, किरणों को रूप मिलेगा,

लो बन गया है सूरज, अब थोडी सी धूप हो जाए,


आज आसमान सफ़ेद है, थोडी मस्ती हो जाए!


Mummy की चमकीली साड़ी है,

कोना लेंगे उस में से,

सफ़ेद-सफ़ेद पानी मिला कर उस में,

चमकीला कर देंगे और थोड़ा,

बंटी की छोटी प्लेट से फिर बनेगा एक छोटा गोला,

अच्छा है इस में किरणें नही है,

इसी लिए चाँद बनाना ही सही है,

पर सफ़ेद आसमान में सफ़ेद चाँद कहीं न खो जाए!


कोई बात नही, आज आसमान सफ़ेद है, थोडी मस्ती हो जाए!

सच

आंखों से आंसू टपकाते,
बार-बार पलकें झपकाते,
खड़े पैरों पर डगमगाते... आते,
मुझसे बोली, "आप नहीं समझोगे... आपके पास माँ का दिल नहीं है न ।"


सच भी है - बच्चे ने "माँ" कहा था पहले,
"बाबा" कहने में कुछ दिन लगे थे,
माँ की उस जीत पर,
पिता ने कई आंसू ठगे थे,
सुबह दो नन्हे हाथ,
सिर्फ माँ की ही गर्दन से लगे थे,
मामूली सी खांसी पर जब,
रात भर माँ-बाबा दोनों बराबर जगे थे।


एक हाथ में दामन का कोना,
दूसरे में मेरी ऊँगली रही थी,
चलना सीखा, छूठी ऊँगली,
हर शाम तो उसके बाद भी, माँ के दामन में ही ढली थी।

जलती पूरियों का दोष ख़ुद पे लेता,
क्यूँ न हो? था तो - "अपनी माँ का लाडला बेटा" ।

हर सवाल, हर राज़, हर बात,
माँ के ही कानों में पहले पड़ती,
शायद मेरे दुःख में, मेरे आंसू शामिल नहीं हैं न,
क्या करुँ ? मेरे पास माँ का दिल नहीं है न ।

सालों बाद आज जब घर लौटा है,
माँ के गले लग, बच्चे की तरह रोता है,
पता नहीं क्यूँ माँ को देख, आँखें भावी हो जाती हैं,
पिता के आगे, सारी शिकायतें आंसूओं पर हावी हो जाती हैं ।

पर आज गले लगा तो, गला भर आया,
सालों का ग़म, आंखों में उतर आया,
पुछा मैंने, "क्यूँ तेरी माँ, तेरे पीछे, तेरे आगे, इतना रोती है?"
सोचा... फिर बोला... " आप नहीं समझोगे बाबा, आपके पास माँ का दिल नहीं है न ।"

बीते साल, एकाएक, मेरे सामने उतर आए
आज इस पिता के आंसू भर आए।
मुझसे बोला, "बाबा आप को क्या हुआ ?"

मैं मुस्कुरा के बोला, "तू समझेगा पर कई सालों बाद...

"तू समझेगा...

पिता का दिल है न ।

Friday, July 18, 2008

आज चाँद पूरा है

आज चाँद पूरा है,
अब्र फिर अदावत पर उतर आयेंगे।
ढकेंगे, छुपायेंगे, दफ्न कर देंगे नूर,
आदत नही है ये, है गुरूर,
हर रेशे को चुन-चुन, क़त्ल किया जायेगा
आज फिर हिज्र को तमगा-ऐ-गुनाह-ऐ-वस्ल दिया जायेगा।

घेरा जायेगा फिर माहताब को,
आसमान भर के साये, फ़क़त एक हरारत पर उतर आयेंगे ।
आज चाँद पूरा है
अब्र फिर अदावत पर उतर आयेंगे

हर सितारे के क़स्बे पर हक़ जमाने की कोशिश को,
आज फिर नाकाम किया जायेगा,
सदियों से चली आई इस अदावत को,
आज तमाम किया जायेगा
नज़रों में लहू आज आया है,
आज के फैसले रिवायत पर उतर आयेंगे
आज चाँद पूरा है
अब्र फिर अदावत पर उतर आयेंगे
क़स्बे, रियासतें, होंगी लहुलुहान,
सदियाँ करेंगी बखान,
आज टुकड़े होंगे,
सदियों दुखड़े होंगे,
इनायत हुई अगर तो,
कबीलों के काफ़िले विलायत पर उतर आयेंगे

आज चाँद पूरा है
अब्र फिर अदावत पर उतर आयेंगे
कल चाँद कटेगा,
कल चाँद कटेगा ।

Thursday, July 10, 2008

मैं मर रहा हूँ

शायद ख़ुद को खुदा समझा है, इसी लिए ये जुर्रत कर रहा हूँ,
साँसों से मन भर गया, मैं मर रहा हूँ।

मेरा सच, करोड़ों का झूठ है, उनका झूठ मेरा सच,
उन्हें मुझसे खेद है, मुझे उनसे हर्ज,
खुदाई में बंदगी से डर रहा हूँ।
साँसों से मन भर गया, मैं मर रहा हूँ।

न किसी के अश्कों की मैं वजह बना,
फिर भी हर अश्क की वजह हूँ,
कहने को इक तरफ़,
फिर भी हर जगह हूँ,
बंदगी में खुदाई से डर रहा हूँ।
साँसों से मन भर गया, मैं मर रहा हूँ


ज़्यादा खुशी और ज़्यादा ग़म में फर्क नहीं,
दोनों में ही भीगती हैं आँखें,
दोबारा चलने से पहले,
एक पल रुकती हैं सांसें,
उस एक पल की मौत में जिंदगी भर रहा हूँ,
साँसों से मन भर गया, मैं मर रहा हूँ


मेरी नज़रों के प्यार को तरसता हो कोई,
ख़ुद से नफरत हुई जाती है ऐसे प्यार से,
जिंदगी ने खूब देखा मुझे इस ओर से,
अब जिंदगी को मैं देखूँगा उस पार से
बिखरे लम्हों से ख़ुद को समेट, संवर रहा हूँ।
साँसों से मन भर गया, मैं मर रहा हूँ

Tuesday, June 24, 2008

Why?

The biggest challenge in life is to understand love.

It’s not a technical piece of information but its equally challenging. The reason why I think people don’t understand it is because people try to do it. They are desperately making an attempt to understand it.

There’s so much written, read, analyzed, spoken about it that everyone in the world seems to be trying too hard to crack it.

Ground rules:

Say ‘I love you’, at least once a day. What the heck? Don’t u f<>#% know it?

Call. Why? Isn’t the feeling enough? That someone loves you?

Be there. You can’t really define this one. Calling, meeting nothing is enough.

All I want to say is if you love someone, it stays. For life. That defines you. That makes you understand the world better. That makes you feel special. That makes you happy. That brings a smile on your face.

But here we are, trying to feel more loved, trying to reason it out, trying to enjoy the feeling. In the process, ending up doing jackshit!

It’s simple. When you know you love someone and that someone knows you love him/her, that’s it. It’s a feeling. Not a science report. Don’t reason it.

Trust me. These seem like only words and you Think you are already doing it. Trust me, no one is. And its more difficult than making rocket fuel.

Monday, June 9, 2008

आपकी याद

आपकी याद आती रही, रात भर,
चश्म-ऐ-नम मुस्कुराती रही, रात भर ।

रंग-औ-बू की पहचान हमें रही ता-उम्र,
सारी इल्म डगमगाती रही, रात भर।

वस्ल का वास्ता दिया हिज्र को,
तमन्ना मात खाती रही, रात भर ।

रंगत का सबब आईना पूछता रहा,
नाम तेरा झुठलाती रही, रात भर ।

अश्कों को धमका रखा था, तो,
चश्म--नम मुस्कुराती रही, रात भर

Sunday, June 8, 2008

उसे छूना है

Sensual: Gulzar style

उसके जिस्म के रुओं के एहसास की प्यास, इन उँगलियों की मुलायम सी सतह को है,
रूह चाहती उसे किसी वजह से नही, इश्क़ तो फ़कत उसी वजह से है ।


Romantic: Prasoon joshi style

मन करता है, हथेलियों को हथेलियों में, उँगलियों को उँगलियों में, खो दूँ,
मेरी हँसी वो हँसे, मैं उसके आंसू रो दूँ,
उसके नाखूनों के उगते सूरज की रंगत, मैं अपने नाखूनों में बो दूँ ।

Romantic: Normal

उसकी छुअन का एहसास साँसों में घुला है, रंग कुछ अलग ... मिला-जुला है ।
दिल है की जिद्द पे अडा है, उसके जिस्म के एहसास को महसूस करने पे तुला है ।

Wednesday, June 4, 2008

A new day - Prelude - Book 1 - Draft 3

It was a beautiful morning.

Rohan's eyes were still sleepy. He was smiling. A smile that was pure, serene and flawless. He had seen everything. Broken promises, made new ones and broken them again. He had no regrets. About anything. And absolutely no complaints.

He knew he was responsible for a lot of strained relationships and a lot of incomplete emotions.

Thats how all of us are. Life is about incompleteness.

His mind was at peace. No thoughts, no images, no naked school girls... nothing. He was not thinking about anyone. His heart was at peace. He was at peace.

Without an iota of change in his expression, he tightened the grip on the knife, which was already half-buried into the veins of his left hand.

This is going to be a little difficult. The up and down movement of the knife. But thats how everything in life is. A 'little' difficult.

He slowly moved the knife. Up. Down. Up. Down. The smile was brighter now.

He then artistically bent the upper portion of the knife, so that it sinks further deep into his wrist. And it did. Now, it was the lower portion. The blood flew. It felt relieved. For the first time, it was set free.

Up. Down. Up. Down.

The first ray of light touched Rohan's eyelashes. The smell of the light was mesmerising. Rohan knew it would absorb the droplet of water from his eyelash. It would absorb the darkness, thus the impurities.

Within seconds his room was lit. His gaze moved from his hand to rachna. She was still asleep. The light trying to wake her up. She blocked the light by her hand. The sheet barely covered her body.

She is beautiful. The most beautiful woman on the planet.

He did not want to blink. He wanted to keep looking at her body. He wanted to feel the warmth of her body against his. He loved her.

He tightened the grip even further and this time the action was vigorous. This time, he knew, he wont lose.

He saw the view outside. Yet again.

A new day in my life. A beautiful new day.

Wednesday, May 28, 2008

आज

आज पैरों के तलवे भीगे से लगते हैं

नाखूनों के आस-पास पड़े पानी के छींटे से लगते हैं

निकली थी खुरदरी ज़मीन पर उसकी तलाश में

उसके एहसास फकत से ये पैर आसमान पर पड़े से लगते हैं


कल गुजरी थी इसी चौराहे से, सड़कें भागती थी,

आज सारे मोड़ खड़े से लगते हैं

उँगलियों की गिटियाँ मुलायम सी,

हथेली की रेखाओं के सारे मोड़ नए से लगते हैं






Monday, May 5, 2008

कभी

आंखों से कभी ख्वाहिशें तो की होती,

ज़िंदगी कभी फकत लम्हों में ही जी होती


अश्कों का हिसाब तो रखा उम्र भर,

कभी मुस्कुराहटों की गिनती भी की होती.


आज फिर हवा के झोंकों ने जगा दिया,

काश उनसे इतनी दुश्मनी न ली होती.


मिटते गए निशाँ, बुझती गई आहटें,

साँसों की दीवानगी, खुदा ने इन्हें भी बख्शी होती.


उसने तो निभाई खुदाई अपनी

हमने कभी बंदगी तो की होती.


जज्बातों का सबब ही तलाशते रहे,

जज्बातों की कद्र तो की होती.


अकेले मोड़ पर अकेले खड़े, सोचा,

कभी कोई राह तो चुनी होती.


रगों से कुरेद-कुरेद, जुनूँ निकाल दिया,

काश थोडी संजीदगी बरती होती.