Friday, March 16, 2012

इक

इक होवे जो इश्क़ करे
इक होवे जो क़द्र करे

Thursday, March 15, 2012

दूर

कुछ तो ऐसा मेरे लफ्ज़ ज़रूर कहते हैं
जो सुनने वाले इनसे दूर-दूर रहते हैं

Wednesday, March 14, 2012

आशिक़ शायर आशिक़

मेरे लफ़्ज़ों से धोखा खा जाते हैं शायद
नादान एक शायर में आशिक़ ढूँढ़ते हैं
फिर आँखों के फ़रेब में आ जाते हैं शायद
नादान एक आशिक़ में शायर ढूँढ़ते हैं

जो भी कहूँ, झूठ समझते हैं
मेरे ग़म पर फ़ितने कसते, हँसते हैं
अब जब अपने पे हंसने लगा हूँ
तो मुझ में कायर ढूँढ़ते हैं
नादान एक आशिक़ में शायर ढूँढ़ते हैं

बेख़ुदी में जब भी नाम लिया कोई
जैसे जलता खंजर थाम लिया कोई
आ गए, सही, मज़हब, दायरे में तोलने वाले
आ गए मेरी हस्ती टटोलने वाले
ज़र्रा-ज़र्रा क़तरा-क़तरा इक-इक ढूँढ़ते हैं
एक शायर में आशिक़ ढूँढ़ते हैं

ये दुनिया तो ठीक थी
पर तुझे क्या हुआ यार मेरे
क्यूँ तुझे भी लगते हैं हाव-भाव बेदार मेरे
क्या तुझे नहीं लगते अलफ़ाज़ तलबगार मेरे
मैं वो शायर नहीं जिसे इश्क़ हो गया
मैं तो वो आशिक़ हूँ जो शायर हो गया

Friday, March 9, 2012

इश्क़ ग़रीब

आशिक़ सारे फुक्रे होते हैं

जब देखो जुबां लटकाए
दर-एक-बज़्म पे पड़े रहते हैं
दिन ढले चाँद चढ़े
यार के इंतज़ार में खड़े होते हैं
जब हाथ न कुछ लगा
तो इंतज़ार को धन-दौलत कह लिया
बड़े बेश्कीमती इनके दिल के टुकड़े होते हैं
आशिक़ सारे फुक्रे होते हैं

शायर जो हो गए आशिक़
तो जैसे मुफ़लिसी को चाँद लग गए
इंतज़ार, उम्मीद, हसरत
हर बात पे मिसरे होते हैं
हर शायर को इश्क़ हुआ
आशिक़ चाहे शायर हो
आशिक़ सारे फुक्रे होते हैं

सीधी सी बात है न
जिसे हसरत है - ग़रीब है
ख्वाब-औ-ख्वाहिश है - ग़रीब है
जिसे इंतज़ार है - ग़रीब है
भीख मांगता है - ग़रीब है
हाथ फैलाता है - ग़रीब है
अब ये मत कहना के
आशिक़ होंगे ग़रीब पर इश्क़
नायाब, महान, बेश्कीमती है
पर भाई ग़रीबी ही तो ग़रीब रखती है
आशिक़ ग़रीब तो इश्क़ ग़रीब
और दिया भी क्या है इश्क़ ने
होश, नींद, चैन, अक्ल,
ख़ुदी, खून... सब तो छीन लिया
इश्क़ वो ग़रीबी है जो जान के साथ ही जाती है

मीर, ज़फर, ग़ालिब, ज़ौक
फिर हरिवंश, कैफ़ी, अमृता, साहिर
कौन सा शायर जिसे इश्क़ न हुआ
कौन सा, जो मुफ़लिस न मरा
मसर्रत के किस्से कहाँ
सुनाने को बस नाला-औ-दुखड़े होते हैं
आशिक़ सारे फुक्रे होते हैं

दुनिया से छिपा फिरता है
रोज़ अपनी ही नज़र में गिरता है
शैतान का जाना है ये इश्क़
हमेशा अधूरा ही रखेगा
आशिक़ और इंसां के बीच
एक ग़रीबी की लकीर बनाके रखेगा
बन्दे से हो या भगवान् से
ये कमबख्त फ़कीर बना के रखेगा

Core thought - Garima

उठ मेरी जान

उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं
नब्ज़-एक-हस्ती का लहू कांपते आंसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नेह्क़त खमे-गेसू में नहीं
जन्नत एक और है जो मर्द के पहलु में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं बस अश्कफिशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है एक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे

- कैफ़ी आज़मी

मीर


आज कल
एक-आध घंटे के लिए
मीर की एक क़िताब
सीने से लगा के घूम रहा हूँ
कुछ तो ज़हन में चला जाएगा

क्या तक़लीफ़ थी इन शायरों को
इतना रंज, इतना दर्द क्यूँ था इन्हें ?

हाँ सुना तो है
के स्याह ग़म, स्याही में ढल जाता है
ग़म से ही तो
मिसरों में वज़न आता है
भई हर किसी को
दुसरे के ग़म से लुत्फ़ आता है
और शायर-जात का हर उस्ताद
सुरूरज़दा हो, हर शब्
अपने ही ग़म का जश्न मनाता है
एक डोर और है
हर शायर जिस से बंधा है
ये धागा है इश्क़ का
ज़ाहिर है, क्यूंकि
इश्क़ से बड़ा क्या ग़म ?

एक बात और परेशां करती है मुझे
ये सारी नज्में, बे-वक़्त, बे-तारीख़ क्यूँ हैं?
पर ख़ुदा--सुख़न 'मीर' तो ख़ुद भी बे-तारीख़ हैं
ख़ुदा कब जन्मा, ये बन्दे कब जाने हैं

अब भी अशआर कहो तो नए से लगते हैं
या तो हम आगे न बढें हैं तब से
या वो शायर मरे नहीं
लिख कर हाल-ए-दिल ज़रिया-ऐ-तक्खलुस
वो कायर डरे नहीं

काली सी क़िताब है
इक तरफ़ उर्दू है
इक तरफ़ हिंदी
इक तरफ़ उलटी, इक तरफ़ सीधी
वक़्त रहते वरक़ पीले हो चुके हैं
इतिहास और रेख्ते में
हाथ मेरा ज़रा ढीला है
शायद ज़रा सी 'मीरगी' आ जाए

सुना है जहाँ मज़ार थी मीर की
आज वहां रेल की पटरी है
मिट्टी अब भी गर्म है आतिश--जिग़र से
जाने अनजाने में लोहा चलना ही था

मैं भी कुछ भी बोल रहा हूँ
कभी क़िताब की बात
तो कभी मज़ार
कभी रंज-औ-ग़म का ज़िक्र
तो कभी तारीख़ की फ़िक्र
न तुक बैठा है न जुबां साफ़ है
पढ़ेया मीर क़सीदा पढ़ेया
इस नशे में सब माफ़ है

दीवान-ए - मीर में बाज़ार है ग़म का
ख़रीद नहीं पाया कोई मगर
दाम किसी न लगाया भी नहीं
न कोई बोली उठी
न अब अहर्फियों का ज़माना रहा
न कोई कुछ दे पाया, के व्योपार होता
ये तो आशिक़ी पे बिकता है
होता है तो
एक नज़र में खरीदार दिखता है
इक खुशनुमा सी दीद हुई - ख़रीद हुई

ये ज़ौक अब कहाँ रहा
ये कोई आयतें नहीं जो
दिन में पांच बार पढ़ी जाती हैं
और ये भी तो बस कहने की बात है
कौन सी ये मुझ में उतर आएगी
न मेरी भाषा है ये, न मेरा धर्म
पर अभी तो सीने से लगाई है क़िताब
आगे आगे देखिये होता है क्या
यहाँ हम मीर बनने का ख़्वाब देखते हैं
कहता है ज़माना जगा कर हमको
तुझे मीर बनना है सोता है क्या
पर अभी तो सीने से लगाई है क़िताब
आगे आगे देखिये होता है क्या

Wednesday, March 7, 2012

आज हूँ, कल नहीं

इतना न मेरे पास आओ
आज हूँ मैं, कल नहीं

ख़ुद अपने लिए
'बेकस' लफ्ज़ का इस्तेमाल करता हूँ
कायर हूँ,
लफ़्ज़ों के पीछे छुपता हूँ
तन्हाई से इश्क़ है मुझे
क्यूँ तन्हाई से इश्क़ करता हूँ
ये राज़ ज़रा सुलझा लूं, पर तुम
इतना न मेरे पास आओ

नाराज़ है ये शबे-तारीक़
आज चाँद भी साथ न लायी
इस अदावत की वजह कौन जाने
ये बेदार क़दम
बंधे किस गिरह कौन जाने
इस सहरा में सहर न हो तो अच्छा
आगे कोई शेहर न हो तो अच्छा
जिस जगह से तुम आवाज़ लगा पाओ
इतना न मेरे पास आओ

बेबसी के सिवा है भी क्या
इसी से तो सब परेशां रहते हैं
कुछ शिकस्ता से जज़्बात के सिवा है भी क्या
हम रहते हैं, फ़ना रहते हैं
शक्ल-औ-सूरत पे न जाओ
आग हूँ
आज हूँ, कल नहीं

मेरी बेईश्की से शिकायत है
यानी मेरे इश्क़ को पहचानते हो
तो बेवजह न कोई इलज़ाम लगाओ
आज हूँ मैं, कल नहीं
अपने दर्द को मेरा रकीब न बनाओ
इतना न मेरे पास आओ
आज हूँ मैं, कल नहीं ।

Tuesday, March 6, 2012

उस रात

उस रात एक क़ब्रिस्तान जला था

मग़र ये ख़बर कहीं दफ़्न रही शायद
फैलती तो आग लग जाती
उस रात हवा में कुछ था
या ये फ़क़त गुमा है
उन लपटों में चीखें तो नहीं थी लेकिन
एक-आध सरगोशी सी थी शायद
चाँद भी शायद
एक पहर पहले ढला था
उस रात एक कब्रस्तान जला था

कभी मिलना तो चाहिए उनसे
जो आग लगा के साहिर बन गए कुछ लोग
वहां मज़हब का परचम लिए
मर कर भी, क़ाफ़िर बन गए कुछ लोग
हाँ एक मज़ार बच निकली
पत्थर पर जो नाम लिखा था
सुना है वो काफ़िरों का पला था

Thursday, March 1, 2012

लफ़्ज़ों में क्या रखा है

वो ढूंढते हैं इश्क़ मेरे लफ़्ज़ों में
कोई कहे क्या के लफ़्ज़ों में क्या रखा है

इसका सबब तो वही जानें
एक तो शौक़ है शायरी का
एक कहते हैं हमने बातों में फंसा रखा है

मुआमले में दिल के अक्सर हम सोचते हैं
अक्सर हम सोचते हैं के सोचने में क्या रखा है

उनकी बज़्म में आ कर सब तमाम हुआ जाता है
इसे छोडें तो दुनिया में क्या रखा है

इस उम्र से पहले का राब्ता है
वर्ना इस उम्र का तो सब कुछ यहाँ रखा है

हर सवाल का जवाब है तो हमारे पास
पर इन बेतुके सवालों में क्या रखा है

साया तो बेतुका सा है, सो है
उस कम्बख्त का क्या जिसने ये साया बना रखा है

मेरे मज़हब से परहेज़ है उनको
यां मेरे मज़हब ने मुझे क़ाफ़िर बना रखा है

Saturday, February 25, 2012

बंजर चांदनी

और कितने अश्क़ पीयेगी,
ये ख़ुश्क रहेगी,
बंजर चांदनी

हर दरार प्यासी है
एक हसीं उदासी है
जैसे आज सीने में लिए बैठी है
खंजर चांदनी

इस ज़मीं से ख़ासा इश्क़ है इसे
हर बार उतर आती है
न सोचती है किसी का न देखती है
मंज़र चांदनी

उसकी आँखों के उजाले से
साँसों की उम्मीद है
दो पल को और जी लूं जो भर लूं
अन्दर चांदनी
मगर क्या ज़िन्दगी देगी ये
बंजर चांदनी

मगर लगता है जैसे
इस ज़मीं से चाँद उगाती है ये
बंजर चांदनी ।

Monday, February 20, 2012

ये दुनिया है किसके पास

अरे यार ये दुनिया है किसके पास ?

आशिक़ तो कहते हैं उन्होंने छोड़ रखी है,
अपनी ही किसी और दुनिया में रहते हैं
उनके पास जिन्होंने इसे डुबा रखा है
रंगीले, बदमस्त पैमानों में ?
या उनके पास जो दुनिया भुला कर,
और ही किसी नशे से परस्त हैं ?

पंडितों और मुर्शदों से तो ये 'मसला' दूर ही रखो
हाँ भई 'मसला'
ज़रा सी बात पूछो तो 'मसला' बन जाता है
और ये तो यूँ भी बड़ा मसला है की
ये दुनिया है किसके पास ?

शायर ता-उम्र मुंह फेरते रहे
जाने किस दुनिया पे फ़ितने कसते रहे
उनकी नज़र से देखो तो हराम थी ये
पर शायर की नज़र का क्या ऐतबार ?
शायर तो उस नस्ल का है
जिसे नुख्स में मज़ा आता है
जब उसकी नहीं तो कैसे हक़ जताता है
के ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ?
ठोकर मारने का हक़ रखते हो तो बताओ
ये दुनिया है किसके पास ?

इंसानों के बाज़ारों में मिलती है क्या?
कितने की पड़ेगी?
मिल गयी तो कितना चलेगी?
गारंटी या छूट मिलेगी?

मैंने कहीं बिकते देखी तो नहीं
मगर मुझ में भी तो शायर वाला कीड़ा है
हक़ से लात मार सकता हूँ
पर ग़ालिब, साहिर, फैज़ के मुक़ाबले
मेरा वक़्त दूसरा है
उन जैसा पागल नहीं हूँ
और उनके जैसा, पूरा दिल के भरोसे नहीं
ज़रा सी अक्ल से काम लेता हूँ
इसी लिए तो कहता हूँ
के हक़ से लात मार सकता हूँ
मगर कोई कम्बख्त ये तो बता दे
के ये दुनिया है किसके पास
बस एक बार मिल जाए, तो छोड़ दूं ।

Wednesday, February 15, 2012

जंग जायज़ इश्क़ गुनाह

जंग जायज़ इश्क़ गुनाह

जग ये छीन लेता है, जग से छीन लेता है
सुकूं नहीं ये कुसूर है
बेशुमार हो तो कर दे बेपनाह,
इलज़ाम जायज़, इश्क़ गुनाह

जो इश्क़ कर सके, वही बैर रख पाता है
जग से लड़ने की आदत में,
ख़ुद से, इश्क़ से रोज़ ये लड़ जाता है
लड़ने के सौ कारण, इश्क़ बेवजह
इलज़ाम जायज़, इश्क़ गुनाह

Tuesday, February 7, 2012

Middle क्लासिये

कुछ लोग free की नसीहत देते नहीं थकते हैं
उन्हें हम सारे फ़िज़ूलख़र्ची लगते हैं
उन्हें ये नहीं पता, हर चीज़ के लिए,
हम उनसे ज़्यादा घिसते हैं
भई हम so called नए ज़माने के लोग,
किश्तों में पिसते हैं ।

२० साल पहले चर्चे हो जाते थे,
जब घर पर Phone लग जाता था,
आज कल उस से ज़्यादा आसानी से
२० लाख का Loan लग जाता है
हर महीने जान खाने, आते फ़रिश्ते हैं
और हम, किश्तों में पिसते हैं

जितनी जल्दी आगे बढ़ने की है,
उतनी जल्दी zero balance होने की भी है
पहले
गेहूं ख़ुद पिसवानी पड़ती थी, अब पिसी मिलती है
idli के लिए दालें, अब पिसी मिलती हैं
पहले लोग मर्ज़ी से घिसवाते थे,
अब हर घर में ख़ुद-बा-ख़ुद घिसे मिलते हैं,
बड़े बड़े, बेवकूफ़ों से, आँखों में सपने लिए,
हम middle क्लासिये,
किश्तों में पिसते हैं ।

Saturday, January 28, 2012

गिद्ध

क्यूँ बन्दे क्यूँ तू, गिद्धों से घबराता है
जीते - जी जब हर कोई तुझको, नोच नोच के खाता है ।

Sunday, January 1, 2012

वापिस दे जा

सुन बे, जाते जाते 2-4 दिन,
और चंद घंटे वापिस दे जा ।

ज़ाहिर सी बात है,
मुझे जो चाहिए,
तू भी जानता है
एक आधा phone call होगा,
और शायद हर मौसम के कुछ पल
एक किताब जो आधी पढ़ी होगी,
एक जो आधी लिखी होगी,
तू क्या करेगा इनका?
ये तो मेरे हैं टंटे, वापिस दे जा ।

तेरे आने पे जो वादे किये थे मैंने,
शराफ़त से लौटा देना,
साल की पहली तारीख़ को ज़रुरत होगी मुझको,
तेरी तरह इसे भी बेवकूफ़ बनाना है
के इस साल तो वज़न घटाना है
ये सब मेरे हैं टंटे, वापिस दे जा

अब ज़मींदारों की तरह मत पूछना,
"इतना वापिस दूंगा तो बदले में क्या लूँगा ?"
क्यूंकि जो 12 महीनों में ले लिया है तूने,
उसका हिसाब शुरू कर दिया तो
साले नंगा वापिस जाएगा ।
शराफ़त से, कपड़े रहते, वापिस दे जा ।

Sunday, December 18, 2011

हीर

रांझे और वारिस शाह की
है एक ही हीर ।

हीर से मन लगा बैठा,
रांझे से राकीबी जमा बैठा,
सुख़न का 'वारिस' एक
क्या ज़फर, क्या मीर ।

"होंठ सुरख याकूत जिऊँ लाल चमकण ठोडी सेब वालईती सार विच्चों,
दंद चम्बे दी लड़ी कि हंस मोती दाणे निकले हुसन अनार विच्चों "

सुन लेती जो हीर ये,
सांस गँवा जाती,
रांझे के चेहरे कि सुर्खी,
पल में हवा हो जाती
रांझे कि नज़र से तेज़
हैं वारिस के लफ्ज़-तीर ।

रांझे ने जो जोग लिया,
वारिस ने भी रोग लिया
एक कड़ी का उसका इश्क़
एक कड़ी इसका जुनूं
दोनों की तक़दीर,
जैसे बांधे ज़ंजीर ।

रिवायत है हिज्र की पंजाब में,
जाने कितने आशिक़
डूबे हैं ख़ूबसूरत चेनाब में
इस देस के हर पत्थर पे,
हर आशिक़ की है एक लक़ीर ।
रांझा जिया हीर के वास्ते
वारिस ने तो जी है हीर
हर वर्क से ख़ुशबू आती है
हर हर्फ़ में घुली है हीर ।

राँझा मर के पा गया हीर,
वारिस ने तो जी है पीर
क्यूंकि है एक ही हीर ।
दोनों की है एक ही हीर ।

Friday, December 9, 2011

चार दीवार

दर्द से बचने को,
ख़ुद के चारों ओर,
दीवार बना, छुप बैठा था,
जब देखा के दर्द बगल में ही,
कुर्सी डाले बैठा है,
तो बदहवासी पे आई हंसी
दीवार उठा के बैठ गए,
छत क्या चाचा डालेंगे ?

Thursday, December 8, 2011

कुछ और

कहते हैं फ़र्क मेरे अंदाज़-ए-बयाँ का है,
मगर मैं कहता कुछ हूँ, वो समझते हैं कुछ और ।

न जाने क्या दर्द दफ़्न हैं सीने में,
अश्क़ बहते हैं तो ये सुलगते हैं कुछ और ।

हर लफ्ज़ से इश्क़ छलकता है,
शायद मैं समझता हूँ कुछ और, वो कहते हैं कुछ और ।

दुनिया, रंज, मलाल, इश्क़ को रो लिए बहुत
दोबारा पढ़ो, ये लफ्ज़ कहते हैं कुछ और ।

Friday, December 2, 2011

रंज का रोशनदान

मसर्रत के सौ दरीचे,
रंज को काफ़ी है एक रोशनदान ।

दरीचों पे परदे लगा कर,
मसर्रत को हर कोई मौका देता है,
अन्दर आने की इजाज़त मांगने का,
रोशनदान से रंज, बिन बुलाये आ बैठता है
जाने कौन मेज़बान, कौन मेहमान ।

आज कल तो हम,
छोटे छोटे flats में रहने लगे हैं,
इनमें रोशनदान नहीं होते
अब इजाज़त तो रंज को भी लेनी पड़ती है ।
पर इसके गुरूर का कोई क्या करे?
बाप का राज समझ कर
आदत से मजबूर,
ये बेदस्तक आ बैठता है
कैसे बदले कोई पहचान ?

जिन्होंने ये flats बनाये हैं,
उन्होंने रंज के रोशनदान बंद नहीं किये,
उनके लिए बड़े बड़े दरीचे खोल दिए हैं ।
मगर रंज को तो काफ़ी है एक रोशनदान ।

Opening couplet by Garima.

Sunday, November 27, 2011

1GB

1GB बढ़ गया हूँ मैं।

ग़म, मलाल, मजाल, ग़ुरूर, के साथ साथ
थोड़ी सी जगह मसर्रत को भी मिल जायेगी ।
इस दुनिया के हिसाब से,
अब इस दुनिया को बेहतर समझूंगा मैं
सबसे ऊंचे "एक-आंकड़े" पर आकर अड़ गया हूँ मैं ।
उम्र घटती नहीं,
ज़िन्दगी बढ़ जाती है
बनते बनते इसकी,
एक शक्ल सी बन जाती है
फिर पसंद आये न आये ।
खूबसूरत तो होती है ।

ये उम्र हर साल नहीं बढ़ती
कई सालों में पहली बार
1GB बढ़ गया हूँ मैं ।