Sunday, April 26, 2009
जश्न - ऐ - मातम
मन्नतों का असर कम लगता है ।
पेशानी की झुर्रियों में अक्सर,
कहीं दफ्न रह जाता है जुनूँ,
जब दर्द हद से गुज़रे,
तो बन जाता है सुकूँ,
नसों में दौड़ता रहता है,
चेहरा हूबहू खूँ
पर आया इस धोखे में कोई ख़म लगता है,
मन्नतों का असर कम लगता है ।
इसे खुशियों से ज़्यादा पाला है,
प्यार से सर पे हाथ फेरा,
मासूम समझ हवा में उछाला है,
मेहमान सा आया था, घर कर गया,
इतना डर दिया, के निडर कर गया,
मगर आज क्यूँ ये डर बेरहम लगता है,
मन्नतों का असर कम लगता है ।
उसी का छोड़ा है,
उसी सा मग़रूर है,
बस येही है जो उसके बाकी में,
दिल को मंज़ूर है,
कहने को तो इसके,
अशआर बड़े मशहूर हैं,
पर उन में वज़न आज कुछ कम लगता है,
क्यूँ एकाएक दुश्मन सा ये ग़म लगता है,
मन्नतों का असर कम लगता है ।
एक हिस्सा दिया था इसको,
आज ख़ुद हिस्सों में हूँ,
एक हर्फ़ छेड़ा था इस पर,
आज सब किस्सों में हूँ,
पहले फ़क़त सावन में निकलता था,
अब तो साल भर येही मौसम लगता है,
क्यूँ एकाएक दुश्मन सा ये ग़म लगता है,
मन्नतों का असर कम लगता है ।
सजदे अब और न करूंगा,
आयतें और न पढूंगा,
इस बार जीत जाने दूँगा इसे,
दुश्मन समझ और न लडूंगा,
अब शुरू ये जश्न - ऐ - मातम लगता है
क्यूँ एकाएक दुश्मन सा ये ग़म लगता है,
मन्नतों का असर कम लगता है ।
Thursday, April 23, 2009
एक बार
जूझ रही थी एक लौ,
हवाएं चलीं थीं सौ,
दो हाथ आए ढकने को,
पर लौ थी मग़रूर,
लहराई और जला डाली दोनों हथेलियाँ,
बड़ी तेज़ थी अटखेलियाँ,
अब नंगी खड़ी थी,
एक बार की बात है,
एक लौ आँधियों से लड़ी थी ।
पहले झोंके से झुक कर, निकली बचके,
दूजे को तो गाल पर दिया तमाचा धर
तीजे को घूरा यूँ, मन में बसाया डर,
चौथे को मारी लंगडी, गिरा वो मुंह के बल,
छुपी पाँचवे से, वो गुज़र गया,
ज़ंग में जायज़ है छल,
छठे के सामने अब फैसले की घड़ी थी,
एक बार की बात है,
एक लौ आँधियों से लड़ी थी ।
मनघडंथ नही ये सच है,
लौ का जज़्बा उसका कवच है,
पटक पटक के हवा को मारती है,
मटक मटक के बगल से निकालती है,
मशालों को दिखलाती है सपने बड़े बड़े वो,
हारना तो है ही,
तो क्यूँ न डट के लड़े वो ?
इसी लिए तो हवा मशालों का साथ देती है,
क्यूंकि उस से एक लौ, कभी जी जान से लड़ी है ।
Tuesday, April 21, 2009
रक्स - ऐ - बिस्मिल
यार को हमने जा बा जा देखा
कभी ज़ाहिर कभी छुपा देखा
हमसे अलग हो कर बिखर गया है,
उसे कभी यहाँ तो कभी वहां देखा ।
आज उसे हमने ख़ुद से खफा देखा ।
The first couplet is from Raqs-e-bismil. But i have written my (harsh) version of it.
A beautiful version shall follow.
मज़हब मेरा
बुत्तों में एहसास तलाशता फिरा हूँ,
बन्दों में मैं लाश सा गिरा हूँ,
फिकरा हूँ - बेहोशी से छिड़ा हूँ,
कई दफा जज्बातों से भिड़ा हूँ,
एहसास सारे जिस्म से रुखसत हो गए हैं,
आ छू के मुझे आज बिस्मिल कर दे ।
मज़हब मेरा आज मुक्कम्मल कर दे ।
सारा गुरूर विरासत में मिला है,
किसी बदकिस्मत वसीहत का सिला है,
दफन हो जाऊँ या जलूँ ?
राख बन गंगा में बहूँ ?
हाथ जोडूँ, या फैलाऊँ?
दाएं बायें देखूं या नज़रें मिलाऊँ ?
न देखूँ, न दिखूँ,
धुंधला ये एक पल कर दे,
मज़हब मेरा आज मुक्कम्मल कर दे ।
तेरे क़दमों की धूल जुबां पे लूँ,
तेरे अक्स को ख़ुद में समां मैं लूँ,
तू ही सहरी, तू ही मगरीब रहे,
तू ही बुत्त, तू ही हबीब रहे
कुफ्र का तू कर दे आज हिसाब,
मज़हब मेरा आज मुक्कम्मल कर दे ।
Thursday, April 16, 2009
सजना तेरे बिना
दिल कमला डुब डुब जावे, सजना तेरे बिना ।
मेहेरां तेरियां अंख नालों ला के,
लहूच कुर्बत तेरी वसा के,
कल्लेयाँ अस्सां टुर जाना,
छेती पा जा एक गेडा,
ऐ बन्दा पलांच मुक् जाना,
उडीकां च ऐ पल मुक् न जावे, सजना तेरे बिना ।
आखेया सी जो तूं,
हिक नालों ला रखेया है,
तेरे लई अज्ज वि,
रास्ता सजा रखेया है,
इक वारि शक्ल विखा जा वे,
अखन नु थोडी जेहि सावाँ लब जावे, सजना तेरे बिना ।
Friday, April 10, 2009
समेट
बिखरे पड़े ख्यालों को,
उलझे पड़े सवालों को,
ज़ंग लगे तालों को,
धूल जमी चालों को,
नेस्त-औ-नाबूत ढालों को,
रंज को मलालों को,
बुझी हुई मशालों को,
उधडी हुई खालों को,
वक्त के उबालों को,
सूखे पत्तों से लदि डालों को,
समेट रहा हूँ ।
कोने कोने में कहीं बिखरे हुए,
पल पड़े हैं तितरे-बितरे हुए,
पड़ी रहेंगी टूटी पलकें,
आंखों के नीचे की काली गहरी खाई में,
उलझी रहेंगी यादें, लम्हों की गीली काई में,
अब बस... समेट रहा हूँ ।
मैं तो यूँ भी सक्षम रहा हूँ,
ऐसे हालात में हर दम रहा हूँ,
तो दर्द न होगा मुझको,
सबकी आंखों का भ्रम रहा हूँ,
सही है, ख़ुद से परे न कोई किसी को जानता है,
अपने दर्द के आगे न किसी के दर्द को कुछ मानता है,
ख़ुद से निकलेगा तो बाहर देखेगा,
ख़ुद से निकलेगा तो ये मंज़र देखेगा,
समेट रहा हूँ ।
Tuesday, March 17, 2009
मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ
तेरे पास रह के भी दूर हूँ, तुझे याद हो के न याद हो ।
ख्वाबों का तेरे सबब हूँ मैं,
उँगलियों की तलब हूँ मैं,
जो आंखों में रह के भी चुभे नही,
ऐसा बिस्मिल फ़तूर हूँ, तुझे याद हो के न याद हो ।
उन लबों पे मेरा ही नाम था,
उस नज़र को मुझसे ही काम था,
तेरी रातों का मैं ही सवेरा था,
तेरा हर सवेरा बस मेरा था,
जो डरे अंधेरों के नाम से,
ऐसा बेबस मैं नूर हूँ, तुझे याद हो के न याद हो ।
मेरी याद तक को मिटा दिया,
न हाथ ही थामा, न बिठा लिया,
नज़रों ने तो बहुत रोका था,
चौखट पे था, तो टोका था,
पर मैं ज़रा सा तो मगरुर हूँ, तुझे याद हो के न याद हो ।
क्यूँ हुए जुदा ये सवाल है,
कहीं थोड़ा सा तो मलाल है,
आंखों में अब भी बाकी,
आँसूओं का गुलाल है,
इस गुलाल का मैं सिन्दूर हूँ, तुझे याद हो के न याद हो ।
तेरी हँसी में भी क्यूँ, कोई ग़म सा है,
खुशी में क्यूँ, चुप, मातम सा है,
ये लब आंखों को धोखा दे जाते हैं ,
तेरे दर्द में क्यूँ मरहम सा है,
इस ग़म में शामिल तो मैं ज़रूर हूँ, तुझे याद हो के न याद हो ।
तेरे नाम के हर हर्फ़ में,
तेरी बेरुखी की बर्फ में,
आवाज़ की तर्ज़ में,
तेरे ज़ख्मों, तेरे मर्ज़ में,
माथे की क़तारों में,
सोच के गुलज़ारों में,
सुबह, कच्ची नींद की पहली सोच में,
वक्त की एडियों की हर मोच में,
आंखों में ठहरे अश्क, जुल्फों की मुश्क में,
नाखूनों के आफ़ताब में,
आंखों की दोनों पुतलियों, के काले माहताब में,
कलाई पे उभरी नसों की हरियाली में,
या उन में बहते लहू की लाली में,
मैं कांच - कांच चकनाचूर हूँ, तुझे याद हो के न याद हो ।
Tuesday, February 24, 2009
साँप
घसीट घसीट पीटता है,
छरहरा है ढीट सा है,
दोमुँही जीभ भी है,
लहू लहू भी खींचता है ।
चमड़ी के नीचे छिपा हुआ है,
लहू से लाल लिपा हुआ है,
हँसता है, डसता नही है,
रेंगता है, फंसता नही है
हौंसलों को सींचता है,
दोमुँही जीभ भी है,
लहू लहू भी खींचता है ।
कुंडली भी मारता है,
केंचुली उतारता है,
वेग भी प्रचंड है,
सर्र सर्र भागता है,
विस्मय नही की,
विषमय है,
जैसे समय की प्रलय है,
जैसे ज़ख्मों की छाप है,
रगों में साँप है ।
शरीर हल्का खुरदरा है,
शिव का पाला, सरचढा है
बाजुओं में लिपटा पड़ा है
अकस्मात कौंधता है,
जैसे पूँछ पर झपटा पड़ा है
पलकें नंगी हैं,
आँखें मलंगी हैं,
रह रह विष से इन्हें सींचता है
दोमुँही जीभ भी है,
लहू लहू भी खींचता है ।
किसी दिन चमड़ी को चीर,
आ जायेगा,
सारा का सारा ये काल,
खा जायेगा,
क्या उजला है, क्या काला
समझा जायेगा
शिव का छोड़ा है,
हाथ न आएगा
हर दबे आक्रोश का,
ये सारा नाप है,
अब रहा ये काँप है
रगों में साँप है ।
Saturday, January 31, 2009
Day 2, 3 And 4
the kicks get harder
The punches become more accurate
My body feel a little more flexible.
Skipping, bending, stretches.
It's just the beginning.
Friday, January 23, 2009
रंग
मुट्ठियाँ कस ली हैं, इस रंग को मिटाना है,
कितनी नींदें खो कर सींचा है इन्हें,
रात रात भर, अंधेरोंसे खींचा है इन्हें,
अब इस रंग को मुझे अपना रंग दिखाना है ।
ढँक दिया है सारे सपनों को,
कफ़न सा बन उन पर फैला है,
इसकी ओट से झांकता है,
हर सपना अब लगता मैला है
जैसे शेहद पर नमक है रखा
सपनों में रंग लगा है पक्का
खुश था मैं बेरंग सपनों से,
आस बांधते अपनों से,
अचानक कहाँ से आ धमका ये,
बेरंगी में रंग क्यूँ चमका ये,
नींद से जगा दिया है,
नया जुनूँ लगा दिया है,
मिटा दूँगा इसे,
हटा लूँगा इसे,
मेरे सपनों पर सिर्फ़ हक़ है मेरा
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
दम घुटने लगा है सपनों का,
साँसे अटकती हैं,
पुतलियाँ आंखों में,
हताश हो भटकती हैं,
पर इतनी जल्दी ये साँसे छोडेंगे नही,
जान से पाले हैं, दम तोडेंगे नही,
मुझसे किया है वादा सेहर तक का ।
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
पर इस बार नींद से जागूँगा नही,
सपनों से दूर भागूंगा नही,
हाथ थाम कर धीरे धीरे,
एक एक कर निकाल लाऊँगा उन्हें,
बेदाग़ बेरंग फिर शायद पाऊंगा उन्हें
जिन्हें रंग दिया होगा इसने,
फिर शुरू से सजाऊँगा उन्हें ।
करूंगा डट कर उस रंग का सामना,
डालूँगा उस में डर की भावना,
सब गाते उसकी खूबसूरती के राग हैं,
पर मेरे लिए वो
मेरे सपनों पर दाग़ है ।
रंग सारे मिटा दूँगा,
सिर्फ़ उजाल रह जायेगा,
बाकी सब धीरे धीरे,
उसी में बह जायेगा,
सब बेरंग हो जायेगा,
फिर न कोई सपने रंग पायेगा,
साफ़ सुथरे धुले धुले से,
पानी के बुलबुले से,
फिर कोई सपनों को न रंग पायेगा,
उजालों में उजला मलंग पायेगा,
सब इस रंग का ही दोष है,
आज जो ज़माना फरामोश है,
हर कोई अपनी ही तरह खिलता है,
जिद्दी है, न किसी से मिलता है
पोंछ दूँगा, उजला कर दूँगा,
सदियों से गंद जमा है रखा,
सपनों में रंग लगा है पक्का ।
Thursday, January 22, 2009
The Mission has begun
21st January 2009
9 AM
Basic warm up. Basic stretching.
3 level kicks. 3 level punching.
The mission has begun. It's the test. Of patience. Capability.
Starting from scratch is a big deal.
The day it pains the most, I will do another round.
Monday, January 19, 2009
Just an average thought
हकों का फ़ैसला सौंप रखा है उनको,
परस्तिश कहो या कह लो डर
हम मना हैं उनके दर पर ।
एहसासों का हिसाब मांगेंगे तो खामोश रहूँगा,
मेरे इस खजाने से वो हैं बेखबर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
अजनबी सा महसूस करता हूँ साथ उनके
लगता है नया हर बार सफर
हम मना हैं उनके दर पर ।
मेरे सवालों का जवाब नही देते वो,
खुदाई का तो पता नही, बंदगी तो है मगर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
लिख भेजी हैं कई हसरतें, कई दफा,
लफ्जों में ये होती बयां कहाँ मगर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
अब वक्त आ गया है, जब बर्दाश्तसे है सब बाहर,
सीधे उनसे पूछ लेते पर,
हम मना हैं उनके दर पर ।
Thursday, January 8, 2009
तर्क - 2
करेंगे आसमाँ के अब्र अब अदावत अदा,
पर जुर्रत के जुर्माने का जुनूँ है जुदा,
पाक़ पैमानों पर परदा पेश हो, कर दो पोशीदा,
रूह में रवां रंज का रंग रहे रंजीदा,
खूँ का खुलूस खुबखु है,
रूह से रुखसत रूमानी, अब रूबरू है ।
फिर फिरदौस की फिराक़ में,
ताज़ी तकदीर की ताक में,
रवां रह गए रब्त राख में,
ख्वाबों की खाली ख़ाक में ।
गुबार की गुफ्तगू गुलाम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
माहौल में मातम मर्ज़ का,
दास्तान-ऐ-दर्द दफ्न, पर दर्ज़ था,
आंखों में अश्क अब अच्छे लगते हैं,
ठहर ठहर ठिकाना ठान के ठगते हैं ।
मुक्कम्मल मुश्क का मुक़ाबला है ,
झोंकों के झरोखों से झांकता है
लहू की लाली लश्कर-ऐ-लगाम हुई ।
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
बेबस, बेखौफ पर बहुत बिस्मिल हूँ,
मयकदों में महफूज़ महफिल हूँ,
मंज़र मंज़र मेरा, मैं मंजिल हूँ,
गुज़रते गुबार की गुज़ारिश,
सागर का संगदिल साहिल हूँ ।
आयतों की आस हूँ,
सजदों का सफ़ेद सबब
कफ़न का काला काफ़ हूँ
लफ्जों का लहू,
मज़हब का मतलब,
जन्नत की जुस्तजू,
मौत में मैं माफ़ हूँ ।
हर्फ़ का होंसला,
ख्वाहिश का खला हूँ,
नुमायाँ में नुमां,
पाकीज़गी पे पला हूँ ।
ज़मीन का ज़र्रा ज़र्रा,
कायनात का कोना कोना,
आफताब की आग,
माहताब की मेहर मैं,
लहू की लाली का लहजा,
कुर्बानी का कहर मैं ।
इश्क की इबादत,
अदावत की अकीदत हूँ
गुरूर का गुस्सा,
माफ़ी की मोहलत हूँ ।
मय की मयकशी,
शौक़ की शोहरत हूँ
सुकूं का सिलसिला भी,
सिलसिला -ऐ - सुकूं भी,
जुनूँ का जज्बा भी मैं,
जज्बा-ऐ-जुनूँ भी
तुझ में तुझ सा,
मुझ में मुझ सा मैं ।
तुझ में तेरी, मुझ में मेरी,
ता-उम्र तराशी तमन्ना तमाम हुई,
तकदीर की ताबीर
ता-उम्र तराशी तमन्ना तमाम हुई,
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
Wednesday, January 7, 2009
तर्क
ख़लिश और सुकूँ में,
कोई बात अब नही जुनूँ में,
जज़्बातों का जज़्बा ज़ब्त हो चला,
रुख़सत रूह से हर रब्त हो चला,
खलता कल तक था जो खला,
ख्वाम्ख्वाह ख़ास अब ये कम्बख्त हो चला,
आरजू की अब शाम हुई,
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
मुआएना किया मासूम मजबूरियों का,
दवा बन दफ़्न हुई दर्दनाक दूरियों का,
लम्हों की लाशें लाद कर लायी गई,
जनाज़ा जन्मा जले हुए जज़्बातों का,
उम्र ऊब उठी थी उन्स से,
नश्तर के निशाँ निकले नब्स से,
आंसुओं की आस भी हराम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
फिकरे फ़क़त फिरोज़ - ऐ - फ़र्ज़ पर हुए,
मशवरे मासूम मातम - ऐ - मर्ज़ पर हुए,
कुरेद कुरेद कर कब्जे कस्म - ऐ- क़र्ज़ पर हुए
खुदा ख्वाहिशें भी खत्म कर दे,
ज़र्रे ज़र्रे में जिस्म के ज़रा सा ज़ख्म कर दे,
हमेशा, हर बार, हरा रहे,
ख्वाहिशों की ख़लिश सा खरा रहे ।
ग़लत ग़म का गुरूर नही,
संभला साँसों से सुरूर नही,
दरीचा - ऐ - दर्द की दोनों ओर देखा,
मैं ही था उसमें जो ग़मगीन था,
अब हर साँस मेरी हराम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई
तर्क की तलाश तमाम हुई ।
Thursday, December 18, 2008
मेरे देश में पैसा सिर्फ़ पैसा नही है .
मेरे देश में पैसा सिर्फ़ पैसा नही है ।
सौ सपने, 101 उम्मीदें,
कहीं दिवाली, कभी ईदें ।
दुआ कह उछाला है,
चेहरे का उजाला है ।
बो के उगाया है,
नम्बर देख कर, बटुए में छुपाया है ।
आंखों का भरोसा है,
चाव से परोसा है ।
माथे पे पहना है,
सर का उतारा है,
कभी कहीं चाँद तो,
कहीं आंखों का तारा है ।
सिरहाने चुपके से छोड़ा है,
नया रिश्ता जोड़ा है ।
माथे पर बल पड़ गए,
जो ग़लती से मोड़ा है ।
देश का रंग है,
जैसा भेस बस वैसा येही है ।
मेरे देश में पैसा सिर्फ़ पैसा नही है ।
Thursday, December 11, 2008
Copywriting interview
Writer banna hai toh agency join kar lo!
Yeh raha email-id, resume e-mail kar do!
Tum jaise hindi bhashi bahut demand mein hain,
Saale baaki ke angrez remand mein hain!
Waise shayari kar lete ho na?
Dikhte toh angrez ho,
Par angrezi padh lete ho na!
Interview ke liye jao toh hindi mein baat karna,
Achhi si do linein Ghalib ki yaad karna!
Cut to the interview!
Writer? Achha? Toh shuruaat kisi chhand(couplet) se karo,
Maine kaha pehle aap mera swagat pan pasand se karo!
Maine kaha pappu paas ho gaya hai!
Usne kaha agency kyun?
Maine kaha kyun nahi?
Maine maanga pani ek glass,
Cold drink pakda di aur kaha sar utha ke piyo,
Maine chance pe dance maara aur kaha, papa ne kaha thha advertising,
Ja kar kahoonga unse - sar utha ke jiyo!
Usne kaha aisa kya hai tum mein jo baaki mein nahi,
Maine kaha mera dil roshan, mera mann roshan,
Andhere mein smile kar doon toh light ki zaroorat hi nahi.
Usne kaha kahan ke ho?
Maine kaha youngistan,
Phir bhi, jagah toh batao,
Maine kaha mera number Mumbai ka toh main bhi Mumbai ka
Usne kaha yahin tikoge na, bhag jaoge who knows?
Maine mobile nikaala aur kaha,
Wherever I go your network follows.
Usne poochi umr,
Maine kaha 29 saal ka boodha nahi 29 saal ka jawaan
Usne kaha kya peeyoge, coffe ya chai,
Maine kaha wah taj!
Usne kaha office dhoondne mein problem toh nahi hui,
Maine kaha nahi, hamara bajaj!
Usne kaha recession chal raha hai,
Phir agency ka naam bhi kharab ho gaya hai,
Maine kaha daag achhe hain.
Usne kaha pichhle office se kya kamaya hai?
Maine kaha rishton ki jamapoonji,
Usne kaha 25,000 salary,
Maine kaha kamse-kamse kam hai,
Usne poocha toh doon kya ek lakh?
Maine kaha sahi jawab,
Usne kaha nikal ja warna tujhe doon kya ek laat?
Monday, December 1, 2008
Iss baar
Iss baar iss baat ki khushi nahi ki main bacha hua hoon.
Pichhli baar bhi yehi socha thha ki ab bas.
To iss baar kya naya tey kiya hai?
Phir mombatti le kar gateway par khade ho jaayenge,
Phir radio stations par phone karke gussa jataayenge,
Is baar nahi jhukenge hum, yehi kaha thha pichhli baar,
Iss baar aur bhi tez hua unka vaar.
Jab sadak par koi mar raha hota hai, to kya iss sheher mein koi usse uthaata hai?
Jab neta ke goonde dukaane todte hain, logon ko marte hain,
to andar ka insaan, mombatti liye, kahan dubak kar baith jaata hai?
Jis parivaar mein bhai bhai mein hi nahi banti,
Uss par to vaar hoga hi,
jab aapas mein hi ladai hai,
to dushman to taiyyar hoga hi.
Iss sheher mein ek din ki roti kamaana hi ek jung hai,
Yahan maut ko jeena waise hi roz ka dhang hai.
wo majborri hai yahan ki, jisse chhupane ke liye,
Hum kehte hain ki yehi to iss sheher ka rang hai!
Agar khud ko bachaana hai,
to ghar ke andar ke dushman ko maar giraana hai.
Hawa se dushmani baad mein lenge,
Pehle to iss pedh ki jadon se deemak ko hataana hai!
Darr jo dikhata hai, wahi rasta sahi hai,
To iss baar bahut darr gaya hoon main,
27 november ko mera janmdin thha,
Iss baar mar gaya hoon main.
Immune System
Lighting candles at the gateway?
Silent protest? Or the new fad - the angry protest?
Politicians resigning?
And how can anyone forget 'Spirit' of mumbai!
Just turn on any radio station for the next week and all you can hear is the Spirit of mumbai.
RJ Says - "I know the line is beaten to death, that spirit of mumbai lives on, but seriously man! This time mumbai has shown the world, and not just India, its true spirit."
The RJ lives 10 kms away from his radio station. He was coaxed into coming to work on the usual working day - thursday.
Just announce on any enthusiastic news channel that all the offices will remain shut for a week. And all the employees can consider this as Paid leave. Then lets see the real spirit of mumbai.
Come on man! Lets face it. Everyone in mumbai is as spirited as someone from say jhumritalaiyya. But, we, dont have a choice.
We have to earn that bread. Spirit has got nothing to do with that. Its helplessness.
What is the solution?
When you already have an infection in your body, you catch a cold easily. And that external virus attack happens because of the failure of an internal immune system.
Taking a D'cold can be a temporary solution. Building a new immune system is the permanent one.
Sunday, November 9, 2008
एक दिन
गिरने के ज़्यादा, संभलने के कम,
चलने के ज़्यादा, रुकने के कम,
कितने आंसू, कितने मुस्कुराहटें,
कितनी ही कच्ची नींद की आहटें,
कितने लगे अधूरे रिश्ते,
अपने एहसास की भरनी पड़ी कितनी किश्तें,
कितना सिखाया, कितना सीखा,
कितने झूठों को सींचा,
कितनी बार ढूँढा नया तरीका,
कितने सारे शक़, कितने मलाल लगे,
इस एक दिन को कितने साल लगे ।
नाक रही सीधी, सीधी चली हूँ मैं,
कईयों से बुरी, कई ज़्यादा से भली हूँ मैं,
कई बार हार के बैठ अकेले रोई,
कई बार अकेले जली हूँ मैं,
मन मुठी में भर कर,
अपने हाथों पली हूँ मैं,
आज सीधी चली अपनी हर चाल लगे,
इस एक दिन को कितने साल लगे ।
वो छत पर निडर हो कर दौड़ना,
एक हाथ से एक साल पकड़ना,
दूसरे से एक साल छोड़ना,
सर्दी की रातों में सिकुड़ के सोना,
हर साल के साथ ये भी बदल गया,
लोग बदले, जगह बदली,
समय के साथ हर रिश्ता बदल गया,
अब न अंधेरे से डरती हूँ न दुःख से,
न तेज़ हवा का खौफ है,
न डरती हूँ उसके रुख से,
रिश्ता अजीब सा है वैसे सुख से,
कभी वो मुझसे रूठ जाता है,
कभी मैं उस से,
पर हर बार अस्तित्व को संभाला है,
हर बार नए रिश्तों को पाला है,
इन सालों से कहीं, ख़ुद को ढूँढ निकाला है,
हर बीते पल में मेरा एक हिस्सा था,
हर हिस्से का अपना अलग किस्सा था,
हर हिस्सा मुझे बहुत प्यारा है,
हर किस्से को उम्मीदों से संवारा है,
अब कई नई उम्मीदें पल रही हैं,
कई भावनाएं आज आंखों में चल रही हैं,
आज लगता सब कुछ नया, अनोखा है,
आज सचमुच आईने में ख़ुद को देखा है ।
ये आज ही हुआ, आज नया दिन है,
लगता है आज फिर जन्मी हूँ मैं,
मिट गए आंसू सारे, मिट गई हर घिन्न है,
लगता है आज फिर जन्मी हूँ मैं,
लगे जैसे हर बोतल में जिन् है,
लगता है आज फिर जन्मी हूँ मैं,
जीवन से भरे सारे पल-छिन हैं,
लगता है आज फिर जन्मी हूँ मैं,
लगता है आज मेरा पहला दिन है,
आज फिर जन्मी हूँ मैं ।
सब कुछ बदलने को सिर्फ़ एक दिन लगा,
पर इस एक दिन को कितने साल लगे ।